माणखां थाणे क्यूँ स्वतंत्रता री चाह

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माणखां थाणे क्यूँ स्वतंत्रता री चाह?
(कविता )
ज्योति स्वामी, बीकानेर, राजस्थान

माणखां थाणे क्यूँ स्वतंत्रता री चाह,
स्वतंत्रता सूं हमेशा भलो नीं होय।
रोका-टोकी री छांय भी जरूरी होवै,
बिण मर्यादा जीवन रो रंग नीं खोय।

ज्यां घणा लाड़-प्यार सूं टाबर बिगड़ जावै,
घणी स्वतंत्रता नेम-कायदा सूं दूर ले जावै।
कोरो आप नै सगळां सूं सयाणो बन इतरावे,
अर आगळी पीढ़ी रो भलो, गुमान में गमावै।

टाबरियां नै जे छूट घणी मिल जावै,
आपणी पुराणी पीढ़ियां सूं दूर सरक जावै।
नई पीढ़ी आज़ादी नै हक समझ बैठी,
स्वच्छंदता नै ई स्वतंत्रता मान बैठी।

बड़ा-बुजुर्गां रो आदर-सत्कार बिसरायो,
संस्कारां रो जगतो दियो भी मन्द पड़ायो।
आपणी मनमर्जी में इसो मदमस्त फिरै,
मदमस्त हाथी ज्यूँ किणी री बात नीं धरै।

स्वतंत्रता रो मतलब मनमानी कोनी,
मर्यादा बिना जीवन सुखद होई कोनी।
हकां रा संग फर्ज निभावणो भी सीखो,
तबै स्वतंत्र भारत रो सांचो मान राखो।

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