माया के अहंकार का सत्य

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Do Not Be Proud of Wealth or Body

जिस शरीर पर आज अभिमान है, जिस धन-संपत्ति को हम अपना समझते हैं और जिन रिश्तों के लिए हम जीवन भर जोड़-तोड़ करते रहते हैं, एक दिन सब यहीं छूट जाना है। फिर किस बात का अहंकार और किस बात का अभिमान?

मनुष्य का जीवन बड़ा विचित्र है। वह इस संसार में खाली हाथ आता है, लेकिन आते ही धीरे-धीरे माया के जाल में उलझने लगता है। धन कमाने की चिंता, संपत्ति बढ़ाने की इच्छा, समाज में बड़ा बनने की चाह और दूसरों से आगे निकलने की होड़ में वह अक्सर यह भूल जाता है कि उसका इस संसार में स्थायी निवास नहीं है। जिस शरीर को वह अपनी शक्ति समझता है, जिस सुंदरता पर उसे गर्व है और जिस वैभव को वह अपनी पहचान मान बैठता है, वह सब कुछ समय के अधीन है।

राजस्थान की धरती पर गाया जाने वाला यह मार्मिक भजन मनुष्य को जीवन का वही सत्य याद दिलाता है, जिसे समझने में कभी-कभी पूरी उम्र बीत जाती है—

“मत कर माया को अहंकार, मत कर काया को अभिमान। काया गार से कांची, रे जैसे ओस रा मोती।”

इन पंक्तियों में जीवन का पूरा दर्शन समाया हुआ है। माया का अहंकार मत कर, शरीर पर अभिमान मत कर, क्योंकि यह काया कच्ची मिट्टी के समान नश्वर है। जिस प्रकार सुबह घास पर चमकने वाली ओस की बूंद सूर्य की पहली किरण या हवा के हल्के झोंके से मिट जाती है, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी क्षणभंगुर है।

धन-दौलत का अहंकार आखिर किस काम का?

मनुष्य जब धनवान हो जाता है, तो कभी-कभी उसे लगता है कि संसार की हर वस्तु उसके अधिकार में है। बड़े-बड़े भवन, महंगी गाड़ियां, नौकर-चाकर और समाज में प्रतिष्ठा उसे अपनी शक्ति का प्रमाण लगने लगते हैं। वह भूल जाता है कि ये सब सुविधाएं जीवन को बेहतर बनाने के साधन हैं, अमर होने का प्रमाण नहीं।

भजन में कहा गया है—

“ऐसा सख्त था महाराज, जिनका मुल्कों में राज। जिन घर झूलता हाथी, उन घर दिया ना बाती।”

कभी ऐसे राजा-महाराजा भी थे जिनके आदेश से बड़े-बड़े राज्य चलते थे। जिनके महलों में हाथी झूमते थे, जिनके दरबारों में वैभव की चमक थी और जिनकी शक्ति से बड़े-बड़े लोग भय खाते थे, आज उनमें से अनेक केवल इतिहास के पन्नों में शेष हैं।

जिन महलों में कभी उत्सव मनते थे, वहां समय के साथ सन्नाटा छा गया। जिन घरों में असंख्य दीप जलते थे, वहां कभी एक दीप जलाने वाला भी नहीं रहा।

यह संसार का नियम है—समय किसी की सत्ता, संपत्ति और सामर्थ्य का स्थायी साथी नहीं होता।

आज जो व्यक्ति अपने पद के कारण दूसरों को छोटा समझता है, उसे यह समझना चाहिए कि पद बदलते देर नहीं लगती। आज जिसके पास अपार संपत्ति है, कल परिस्थितियां उससे सब कुछ छीन सकती हैं। और आज जो किसी कमजोर व्यक्ति का अपमान कर रहा है, कल उसे भी किसी के सहारे की आवश्यकता पड़ सकती है।

इसलिए बड़ा बनना है तो अपने धन से नहीं, अपने कर्मों से बनिए। सम्मान पाना है तो दूसरों को सम्मान देना सीखिए।

शरीर का अभिमान क्यों?

मनुष्य अपने शरीर को सजाने-संवारने में बहुत समय लगाता है। सुंदरता, ताकत, जवानी और स्वास्थ्य पर उसे गर्व होता है। लेकिन समय धीरे-धीरे हर चेहरे पर अपनी कहानी लिखता है। जवानी ढलती है, ताकत कमजोर होती है और शरीर एक दिन अपनी अंतिम यात्रा पर निकल पड़ता है।

भजन की पुकार है—

“झोंका पवन का लग जाए, झपका पवन का लग जाए। काया धूल हो जासी, काया तेरी धूल हो जासी।”

जिस शरीर के लिए मनुष्य जीवन भर सुख-सुविधाएं जुटाता है, अंत में उसी शरीर को मिट्टी में मिल जाना है। मृत्यु यह नहीं पूछती कि व्यक्ति कितना अमीर था, कितना सुंदर था या उसके पास कितनी संपत्ति थी।

मृत्यु के सामने राजा और रंक, धनवान और निर्धन, प्रसिद्ध और गुमनाम—सभी मनुष्य समान हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर की देखभाल न की जाए या जीवन की सुविधाओं का आनंद न लिया जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि शरीर को स्वस्थ रखिए, लेकिन उसके कारण दूसरों को तुच्छ मत समझिए। सौंदर्य पर गर्व करने के बजाय अपने स्वभाव को सुंदर बनाइए। ताकत का प्रदर्शन करने के बजाय किसी कमजोर का सहारा बनिए।

क्योंकि शरीर की सुंदरता समय के साथ बदल जाती है, लेकिन अच्छे कर्मों की सुगंध लोगों के हृदय में लंबे समय तक बनी रहती है।

जीवन एक दीपक है, जिसकी बाती बुझनी ही है

भजन की सबसे गहरी और प्रतीकात्मक पंक्तियां हैं—

“भरिया सिन्दड़ा में तेल, जहाँ से रच्यो है सब खेल। जल रही दीया की बाती, खूट गया सिन्दड़ा रो तेल, बुझ गयी दीया की बाती।”

यहां दीपक मनुष्य के जीवन का प्रतीक है। जब तक दीपक में तेल है, बाती जलती रहती है। जैसे-जैसे तेल समाप्त होता है, दीपक की लौ कमजोर पड़ने लगती है और अंततः बुझ जाती है।

इसी प्रकार मनुष्य की सांसें भी सीमित हैं। जन्म के साथ जीवन की यात्रा आरंभ होती है और समय के साथ हम अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ते जाते हैं। लेकिन इस यात्रा के बीच हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य ही भूल बैठते हैं।

हम सोचते हैं कि अभी बहुत समय है। पहले थोड़ा और धन कमा लें, थोड़ा और नाम बना लें, एक और मकान खरीद लें, दूसरों से आगे निकल जाएं—फिर कभी अपने मन की सुनेंगे, अपनों के साथ समय बिताएंगे और जरूरतमंदों की सहायता करेंगे।

लेकिन जीवन किसी को यह आश्वासन नहीं देता कि उसे कल अवश्य मिलेगा।

कितने ही लोग अपने अधूरे सपनों, अधूरी इच्छाओं और अधूरे रिश्तों को पीछे छोड़कर चले जाते हैं। उनके पास संपत्ति होती है, योजनाएं होती हैं, भविष्य की तैयारियां होती हैं, लेकिन उन योजनाओं को पूरा करने के लिए जीवन नहीं बचता।

इसलिए जीवन को केवल भविष्य के लिए मत टालिए। आज किसी का भला कर सकते हैं, तो कीजिए। आज किसी रूठे हुए अपने से बात कर सकते हैं, तो करिए। आज किसी दुखी व्यक्ति के आंसू पोंछ सकते हैं, तो पीछे मत हटिए।

क्योंकि दीपक के बुझ जाने के बाद तेल का हिसाब रखने से अंधेरा दूर नहीं होता।

रिश्तों का मोह और मृत्यु का कठोर सत्य

भजन में एक अत्यंत विचारोत्तेजक पंक्ति आती है—

“झूठा माई थारो बाप, झूठा सकल परिवार। झूठी कूटता छाती।”

इन पंक्तियों का आशय यह नहीं है कि माता-पिता का प्रेम झूठा है या परिवार के रिश्तों का कोई मूल्य नहीं। इनका गहरा संदेश यह है कि संसार में कोई भी रिश्ता मृत्यु के अंतिम सत्य को बदल नहीं सकता। मनुष्य के जाने के बाद परिवार रोता है, अपने सीने पर हाथ मारकर दुख प्रकट करता है, लेकिन वह किसी भी तरह उस व्यक्ति को वापस नहीं ला सकता।

यहां भजन हमें रिश्तों से विमुख होने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि रिश्तों की वास्तविकता समझाता है।

जब तक माता-पिता जीवित हैं, उनका सम्मान कीजिए। जब तक जीवनसाथी साथ है, उसके प्रेम और भावनाओं को समझिए। भाई-बहनों के बीच संपत्ति के लिए ऐसी दीवारें मत खड़ी कीजिए जिन्हें बाद में पछताना पड़े। मित्रों के साथ विश्वास बनाए रखिए। अपने बच्चों को केवल धन नहीं, संस्कार भी दीजिए।

क्योंकि जब जीवन का दीपक बुझ जाता है, तब पीछे रह जाते हैं कुछ आंसू, कुछ यादें और कुछ पछतावे।

कई बार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद परिवार के लोग कहते हैं—काश, हमने उससे थोड़ा और समय बिताया होता। काश, हम उसकी बात समझ गए होते। काश, एक बार गले लगाकर अपने मन की बात कह दी होती।

लेकिन मृत्यु के बाद का ‘काश’ जीवन में किए जा सकने वाले प्रेम का विकल्प नहीं बन सकता।

इसलिए रिश्तों को तब महत्व दीजिए, जब वे आपके सामने जीवित हैं। प्रेम को कल पर मत छोड़िए।

अहंकार नहीं, विनम्रता ही मनुष्य की असली पहचान है

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा सदियों से मनुष्य को अहंकार त्यागने की शिक्षा देती आई है। श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी गुणों का वर्णन करते हुए कहा है—

“अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥”

— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 2

अर्थात अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शांति, दूसरों की निंदा न करना, प्राणियों पर दया, लोभ का अभाव और कोमलता जैसे गुण श्रेष्ठ जीवन के आधार हैं।

ध्यान दीजिए, जीवन की महानता का आधार यहां धन, पद या बाहरी वैभव नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के गुण हैं।

यदि आपके पास धन है, तो उसका उपयोग किसी जरूरतमंद की सहायता में कीजिए। यदि आपके पास ज्ञान है, तो उसे दूसरों का मार्गदर्शन करने में लगाइए। यदि आपके पास अधिकार है, तो उसका उपयोग न्याय के लिए कीजिए। यदि आपके पास शक्ति है, तो किसी कमजोर को सहारा दीजिए।

जो व्यक्ति अपने से छोटे समझे जाने वाले लोगों के साथ भी सम्मानपूर्वक व्यवहार करता है, वही वास्तव में बड़ा है।

अहंकार व्यक्ति को अकेला करता है, जबकि विनम्रता उसे लोगों के हृदय में स्थान दिलाती है।

मुक्ति का मार्ग गुरु और सही ज्ञान से मिलता है

भजन के अंत में कहा गया है—

“बोल्या भवानी हो नाथ, गुरुजी ने सर पे धरया हाथ। जिनसे मुक्ति हो जासी, हो जिनसे मुक्ति मिल जासी।”

यहां गुरु के हाथ को ज्ञान, मार्गदर्शन और आध्यात्मिक कृपा का प्रतीक माना जा सकता है। मनुष्य जब संसार के मोह, अहंकार और अज्ञान में उलझ जाता है, तब सही ज्ञान उसे अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझने में सहायता करता है।

गुरु केवल वह नहीं जो हमें कोई मंत्र दे दे, बल्कि वह भी है जो हमें गलत रास्ते से सही रास्ते की ओर ले जाए, हमारे भीतर विवेक जगाए और हमें अपने कर्मों का मूल्य समझाए।

मुक्ति का मार्ग संसार छोड़कर भागने में ही नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी लोभ, द्वेष, छल और अहंकार से मुक्त होने में है।

अपने कर्तव्यों का पालन कीजिए, परिवार से प्रेम कीजिए, ईमानदारी से धन कमाइए, लेकिन धन को अपने मन का स्वामी मत बनने दीजिए। लोगों की सहायता कीजिए, मगर बदले में प्रशंसा की अपेक्षा मत रखिए। अच्छे कर्म कीजिए, मगर उनका अहंकार मत पालिए।

यही वह समझ है जो मनुष्य को भीतर से शांत और जीवन को सार्थक बना सकती है।

अंत में: जब सब कुछ यहीं छूट जाना है, तो फिर किस बात का अभिमान?

जरा कल्पना कीजिए—एक दिन हमारा भी अंतिम समय आएगा। जिस घर को बनाने में हमने पूरी जिंदगी लगा दी, वह किसी और का घर बन जाएगा। जिस संपत्ति को अपना समझकर हमने अपनों से विवाद किए, वह दूसरों के बीच बंट जाएगी। जिस पद के लिए हमने अपने सिद्धांतों से समझौता किया, वह पद किसी दूसरे को मिल जाएगा।

हमारी कुर्सी पर कोई और बैठेगा। हमारी जगह कोई और जिम्मेदारी संभालेगा। संसार अपनी गति से चलता रहेगा।

तब हमारे साथ क्या जाएगा?

हमारा धन नहीं, हमारा पद नहीं, हमारा बाहरी सौंदर्य नहीं। हमारे जीवन के कर्म, हमारे व्यवहार से दूसरों को मिली खुशी और हमारे प्रेम की यादें ही हमारे पीछे एक अर्थपूर्ण विरासत छोड़ सकती हैं।

इसलिए इस भजन की अंतिम पुकार को केवल सुनिए मत, अपने जीवन में उतारिए—

“मत कर माया को अहंकार, मत कर काया को अभिमान। काया गार से कांची!”

आज यदि आपके पास सब कुछ है, तो विनम्र रहिए। कल यदि कुछ भी न रहे, तो धैर्य रखिए। यदि कोई आपसे कमजोर है, तो उसे मत दबाइए। यदि कोई आपसे आगे है, तो उससे ईर्ष्या मत कीजिए। और यदि कोई दुखी है, तो उसकी पीड़ा का मजाक बनाने के बजाय उसका हाथ थामिए।

याद रखिए, जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि आपने कितनी संपत्ति जमा की, बल्कि यह है कि आपके कारण कितने लोगों के जीवन में सुख आया।

ओस की बूंद की तरह यह जीवन कब मिट जाएगा, कोई नहीं जानता। इसलिए जब तक सांसें हैं, प्रेम बांटिए, अहंकार छोड़िए, अच्छे कर्म कीजिए और अपने भीतर उस सत्य को पहचानिए जो माया के बदलने पर भी नहीं बदलता।

क्योंकि अंततः—

महल रह जाएंगे, नाम भी मिट जाएंगे, धन-दौलत के सारे किस्से पीछे छूट जाएंगे। जो प्रेम दिया, जो दर्द बांटा, जो आंसू पोंछे किसी के, वही कर्म हमारी कहानी बनकर लोगों के दिलों में रह जाएंगे।

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