प्रीत और प्रेत

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An incomplete love story that did not end even after death.

कहते हैं, प्रीत इंसान को जीना सिखाती है और प्रेत उसे मरने के बाद भी जीने नहीं देता।
लेकिन कभी-कभी दोनों के बीच की दूरी इतनी कम होती है कि समझ ही नहीं आता—जिसे हम प्रेम समझ रहे हैं, वह प्रेम है या किसी अधूरी आत्मा की पुकार।

राजस्थान के एक छोटे-से गाँव में एक पुरानी हवेली थी। हवेली के बारे में मशहूर था कि वहाँ आधी रात के बाद किसी लड़की के पायल की आवाज़ आती है।

छन… छन… छन…

गाँव वाले उस रास्ते से गुजरने तक से डरते थे।

उसी गाँव में आरव नाम का एक युवक रहता था। पढ़ाई के लिए शहर गया था, लेकिन कुछ दिनों की छुट्टी में वापस आया था।

एक रात वह अपने खेत से लौट रहा था। हवेली के पास से गुजरते हुए अचानक उसे पायल की आवाज़ सुनाई दी।

वह रुक गया।

आवाज़ फिर आई—

छन… छन… छन…

आरव ने हवेली की ओर देखा।

टूटी हुई खिड़की के पास सफेद कपड़ों में एक लड़की खड़ी थी।

चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। चेहरा बेहद खूबसूरत था, लेकिन आँखों में ऐसी उदासी थी जैसे सदियों से किसी का इंतज़ार कर रही हो।

आरव ने पूछा—

“तुम कौन हो?”

लड़की ने धीरे से कहा—

“प्रीत।”

आरव मुस्कुराया।

“प्रीत? बहुत खूबसूरत नाम है।”

लड़की की आँखों में पहली बार चमक आई।

“तुम्हें मेरा नाम अच्छा लगा?”

“नाम ही नहीं… तुम भी।”

इतना सुनते ही वह लड़की गायब हो गई।

अगली रात आरव फिर हवेली के पास पहुँचा।

वह लड़की फिर आई।

फिर अगले दिन भी।

धीरे-धीरे दोनों के बीच बातें होने लगीं।

प्रीत उसे अपने बारे में कुछ नहीं बताती थी। बस इतना कहती—

“मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।”

आरव हँसकर पूछता—

“कब से?”

प्रीत की आँखें भर आतीं।

“बहुत सालों से। शायद तुम्हारे जन्म से भी पहले से।”

आरव को उसकी बातें अजीब लगतीं, लेकिन उसके साथ बैठने में एक अजीब-सी शांति मिलती थी।

एक रात आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

प्रीत अचानक पीछे हट गई।

“मुझे मत छूना।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर तुमने मुझे छू लिया… तो तुम मुझे कभी छोड़ नहीं पाओगे।”

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था।

और उसी क्षण हवेली की दीवारों से एक चीख गूँजी।

आरव डरकर पीछे हट गया।

प्रीत रो रही थी।

“अब तुमने मुझे छू लिया है…”

“तुम हो कौन?”

प्रीत ने सिर उठाया।

“मैं प्रेत हूँ, आरव।”

आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

प्रीत ने बताया कि करीब सौ साल पहले वह इसी हवेली में रहती थी। उसका नाम भी प्रीत था। वह एक युवक से प्रेम करती थी। दोनों ने साथ जीने-मरने की कसम खाई थी।

लेकिन परिवार ने उस युवक की शादी कहीं और कर दी।

प्रीत इंतज़ार करती रही।

एक रात उसे खबर मिली कि उसका प्रेमी उसे छोड़कर हमेशा के लिए जा चुका है।

उसने उसी हवेली में अपनी जान दे दी।

लेकिन मरने के बाद भी उसका इंतज़ार खत्म नहीं हुआ।

उसकी आत्मा हवेली में कैद हो गई।

“मैंने बहुत लोगों को देखा,” प्रीत बोली, “लेकिन किसी में तुम्हारा चेहरा नहीं मिला।”

आरव ने पूछा—

“और अगर मैं तुम्हारा वो प्रेमी नहीं हूँ तो?”

प्रीत मुस्कुराई।

“मुझे नहीं पता तुम वही हो या नहीं… लेकिन मेरा दिल तुम्हें पहचानता है।”

आरव उसके प्रेम में पड़ चुका था।

लेकिन अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह एक लड़की से प्रेम कर रहा है या एक प्रेत से।

उसने गाँव के बुजुर्ग से सब कुछ बताया।

बुजुर्ग ने कहा—

“बेटा, उससे दूर रहो। वह तुम्हें अपने साथ ले जाएगी।”

आरव ने पूछा—

“अगर वह बुरी नहीं है तो?”

बुजुर्ग ने कहा—

“प्रेत हमेशा बुरा नहीं होता… लेकिन अधूरी प्रीत अक्सर खतरनाक होती है।”

उस रात आरव आखिरी बार हवेली गया।

प्रीत वहाँ उसका इंतज़ार कर रही थी।

आरव ने कहा—

“अगर मैं तुम्हें तुम्हारी मुक्ति दे दूँ तो?”

प्रीत की आँखों से आँसू बहने लगे।

“और फिर?”

“फिर तुम आज़ाद हो जाओगी।”

प्रीत ने सिर हिलाया।

“मैं आज़ाद नहीं होना चाहती।”

“क्यों?”

वह आरव के करीब आई और बोली—

“क्योंकि सदियों बाद मुझे कोई मिला है, जिससे मैं सच में प्रीत कर बैठी हूँ।”

अचानक हवेली में तेज़ हवा चलने लगी।

दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें गिरने लगीं।

आरव ने देखा—एक तस्वीर में वही लड़की थी।

और उसके पास खड़ा युवक…

बिल्कुल आरव जैसा दिखता था।

आरव की साँसें थम गईं।

प्रीत मुस्कुराई।

“अब समझे?”

“क्या?”

“तुम मुझे पहली बार नहीं मिले…”

उसने आरव का हाथ पकड़ लिया।

“तुम हर जन्म में मेरे पास लौटते हो।”

उस रात के बाद गाँव वालों ने आरव को कभी नहीं देखा।

लेकिन आज भी पूर्णिमा की रात उस हवेली से दो आवाज़ें आती हैं—

छन… छन… छन…

और एक पुरुष की धीमी हँसी।

लोग कहते हैं, वहाँ अब एक नहीं…

दो परछाइयाँ दिखाई देती हैं।

एक प्रीत की…

और दूसरी उस प्रेत की, जो कभी आरव था।

क्योंकि शायद कुछ प्रेम कहानियाँ मौत के साथ खत्म नहीं होतीं।

कुछ प्रीतें मरकर प्रेत बन जाती हैं… और कुछ प्रेत सदियों तक अपनी प्रीत का इंतज़ार करते रहते हैं।

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