द्वारिका — श्रीकृष्ण के हृदय का द्वार
स्कन्द पुराण के द्वारका माहात्म्य और मेरी द्वारिकाधीश यात्रा की अनुभूति
“द्वारिका केवल एक नगरी नहीं, श्रीकृष्ण के हृदय का द्वार है।”
यह स्कन्द पुराण का शब्दशः श्लोक नहीं है। यह वह भाव है जो द्वारिका जाकर, द्वारिकाधीश के दर्शन करके और फिर स्कन्द पुराण में द्वारका की महिमा पढ़कर मेरे मन में और गहरा हो गया।
कुछ तीर्थ ऐसे होते हैं जहाँ हम अपनी इच्छा से जाते हैं…
और कुछ तीर्थ ऐसे होते हैं जहाँ पहुँचकर लगता है—
हम आए नहीं हैं, हमें बुलाया गया है।
मेरे लिए द्वारिका ऐसी ही थी।
जैसे-जैसे द्वारिका करीब आती गई, रास्ते की थकान पीछे छूटती गई और मन में केवल एक ही नाम बचा—
“द्वारिकाधीश… द्वारिकाधीश…”
मन में बस एक प्रतीक्षा थी—
कब वह क्षण आएगा जब मैं अपने कान्हा के सामने खड़ा होऊँगा?
स्कन्द पुराण में द्वारिका
द्वारिका के प्रति यह भाव केवल आज के भक्त की श्रद्धा तक सीमित नहीं है।
स्कन्द महापुराण के प्रभास खण्ड के चतुर्थ भाग ‘द्वारका माहात्म्य’ में द्वारका, भगवान श्रीकृष्ण, गोमती, चक्रतीर्थ, गोपीचंदन, तुलसी, द्वारका-यात्रा, दर्शन, निवास और भगवान के स्मरण की विस्तृत महिमा कही गई है।
स्कन्द पुराण के द्वारका माहात्म्य में एक अत्यंत सुंदर श्लोक मिलता है—
“आलोड्य सर्वशास्त्राणि पुराणानि पुनःपुनः।
मया दृष्टा महीपाल न द्वारकासमा पुरी॥”
भावार्थ: अनेक शास्त्रों और पुराणों का बार-बार अवलोकन करने के बाद भी द्वारका के समान दूसरी पुरी नहीं मिली।
कितनी अद्भुत घोषणा है!
मानो पुराण स्वयं कह रहा हो—
बहुत तीर्थ देख लेना, बहुत पुरियाँ देख लेना…
लेकिन द्वारिका की बात कुछ और ही है।
और शायद इसका कारण भी एक ही है—
जहाँ कृष्ण हैं, वह भूमि साधारण कैसे हो सकती है?
“द्वारिका जाकर कृष्ण का मुख देखो”
स्कन्द पुराण में एक और अत्यंत भावपूर्ण श्लोक आता है—
“मा काशीं मा कुरुक्षेत्रं प्रभासं मा च पुष्करम्।
द्वारकां गच्छ राजर्षे पश्य कृष्णमुखं शुभम्॥”
भावार्थ: हे राजर्षि! काशी, कुरुक्षेत्र, प्रभास और पुष्कर की अपेक्षा द्वारका जाओ और श्रीकृष्ण के शुभ मुख का दर्शन करो।
इसे दूसरे तीर्थों का तिरस्कार नहीं, बल्कि द्वारका और कृष्ण-दर्शन की महिमा का पुराणिक स्तुतिपरक वर्णन समझना चाहिए।
और जब यह श्लोक पढ़ता हूँ तो मुझे मंदिर की वह कतार याद आती है।
द्वारिकाधीश मंदिर की वह कतार…
मंदिर पहुँचा तो सामने भक्तों की लंबी कतार थी।
इंतजार था।
भीड़ थी।
लेकिन पता नहीं क्यों उस दिन वह इंतजार भी अच्छा लग रहा था।
क्योंकि यह इंतजार किसी मनुष्य का नहीं था…
अपने भगवान का था।
उस कतार में कोई धन माँगने आया होगा।
कोई अपने परिवार की खुशहाली माँगने।
कोई बीमारी से मुक्ति की प्रार्थना लेकर आया होगा।
कोई अपने जीवन का दर्द लेकर आया होगा।
और कोई शायद कुछ माँगने आया ही नहीं होगा…
वह केवल कृष्ण को देखने आया होगा।
उस दिन समझ आया—
यह केवल मंदिर की लाइन नहीं थी।
यह आस्था की कतार थी।
यह विश्वास की कतार थी।
यह कृष्ण तक पहुँचने की कतार थी।
और फिर सामने थे मेरे द्वारिकाधीश…
धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ते गए।
और आखिर वह क्षण आ गया जिसका मन इतने समय से इंतजार कर रहा था।
सामने द्वारिकाधीश थे।
उस क्षण जैसे समय कुछ पल के लिए रुक गया।
न कोई इच्छा याद रही।
न कोई शिकायत।
न संसार की चिंता।
आँखें बस उन्हें देखती रहीं।
और मन ने कहा—
“कान्हा… अब किसी और को देखने का मन नहीं बचा।”
बाद में जब स्कन्द पुराण पढ़ा तो एक श्लोक ने उस अनुभूति को और गहरा कर दिया—
“दृष्ट्वा कृष्णपुरीं रम्यां कृष्णस्य मुखपंकजम्।
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं सभाग्योऽहं धरातले॥”
भावार्थ: सुंदर कृष्णपुरी और श्रीकृष्ण के मुखकमल का दर्शन करके मनुष्य स्वयं को धन्य, कृतकृत्य और पृथ्वी पर सौभाग्यशाली अनुभव करता है।
यह श्लोक पढ़ते समय लगा—
यही तो उस दिन मेरे मन की अवस्था थी।
मैंने श्लोक तब नहीं कहा था…
लेकिन मन ने शायद उसी भाव को महसूस किया था।
“इतने तीर्थों की फिर क्या आवश्यकता?”
इसके ठीक आगे द्वारका माहात्म्य में एक और अत्यंत प्रबल भाव आता है—
“दृष्ट्वा कृष्णमुखं रम्यं रुक्मिणीं द्वारकां पुरीम्।
तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम्॥”
भावार्थ: श्रीकृष्ण के सुंदर मुख, रुक्मिणी और द्वारका पुरी के दर्शन के बाद असंख्य तीर्थों के सेवन की फिर क्या आवश्यकता?
यह पुराण की भक्तिपूर्ण महिमा-वाणी है।
और मेरे लिए इसका भाव बहुत व्यक्तिगत हो जाता है—
मन में बसे द्वारिकाधीश,
अब किसी और को देखने का मन नहीं बचा।
द्वारिका और गोमती
स्कन्द पुराण में द्वारिका के साथ गोमती की महिमा भी बार-बार आती है।
द्वारका माहात्म्य में कहा गया है—
“स्वर्गारोहणनिश्रेणी वहते यत्र गोमती।
सा पुरी मोक्षदा नृणां…”
अर्थात जिस पुरी में गोमती प्रवाहित होती है, उस द्वारका को मनुष्यों के लिए मोक्षदायिनी पुरी के रूप में महिमामंडित किया गया है।
और आगे एक अत्यंत सुंदर भाव आता है—
“गत्वा कृष्णपुरीं दृष्ट्वा गोमतीं चैव सागरम्।
मन्ये कृतार्थमात्मानं जीवितं यौवनं धनम्॥”
भावार्थ: कृष्णपुरी, गोमती और समुद्र का दर्शन करके मनुष्य स्वयं को कृतार्थ मानता है।
द्वारिका में इसलिए केवल मंदिर नहीं है।
द्वारिकाधीश हैं,
गोमती है,
समुद्र है,
कृष्ण की स्मृति है,
और उस स्मृति में डूबा हुआ पूरा वातावरण है।
द्वारिका के समान कोई पुरी नहीं
स्कन्द पुराण इस भाव को एक और स्थान पर अत्यंत स्पष्टता से रखता है—
“समाना वाऽधिका वापि द्वारवत्या न कापि पूः॥”
भावार्थ: द्वारवती के समान अथवा उससे श्रेष्ठ कोई दूसरी पुरी नहीं है।
यह पुराणिक स्तुति का उत्कर्ष है।
लेकिन जब कोई भक्त स्वयं द्वारिका जाकर आता है तो उसे इस अतिशयोक्तिपूर्ण लगने वाली भक्ति-वाणी के पीछे छिपा प्रेम समझ आने लगता है।
क्योंकि द्वारिका केवल आँखों से नहीं देखी जाती—
द्वारिका मन से देखी जाती है।
द्वारिका में निवास की महिमा
स्कन्द पुराण के द्वारका माहात्म्य में केवल द्वारका पहुँचने और दर्शन करने की ही नहीं, बल्कि द्वारका में रहने और वहाँ के सान्निध्य की भी अत्यंत ऊँची महिमा कही गई है।
अध्याय 35 में एक अद्भुत श्लोक मिलता है—
“द्वारकावासिनं दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा चैव विशेषतः।
महापापविनिर्मुक्ताः स्वर्गलोके वसंति ते॥”
भावार्थ: द्वारका में निवास करने वाले के दर्शन और विशेषतः स्पर्श तक की अत्यंत बड़ी धार्मिक महिमा बताई गई है।
और इसके अगले ही श्लोक का भाव तो और भी अद्भुत है—
“पांसवो द्वारकाया वै वायुना समुदीरिताः।
पापिनां मुक्तिदाः प्रोक्ताः किं पुनर्द्वारका भुवि॥”
भावार्थ: द्वारका की वह धूल भी, जिसे वायु उड़ाकर ले जाती है, मुक्तिदायिनी कही गई है; फिर स्वयं द्वारका भूमि की महिमा का क्या कहना!
सोचिए…
जिस नगरी की धूल तक को पुराण इतना पवित्र कहता है, उस भूमि पर कुछ समय बिताने का सौभाग्य मिल जाए तो भक्त के लिए वह साधारण यात्रा कैसे रह सकती है?
यहीं मुझे अपनी यात्रा फिर याद आती है।
मैं वहाँ कुछ समय रहा।
उन्हीं रास्तों पर चला।
मंदिर की उसी कतार में खड़ा हुआ।
और उसी भूमि पर खड़े होकर अपने द्वारिकाधीश को देखा।
तब समझ आया—
शरीर द्वारिका में कुछ समय रहा होगा,
लेकिन मन ने शायद वहीं अपना घर खोज लिया।
द्वारिका की ओर चलना भी साधना
द्वारका माहात्म्य में द्वारका की यात्रा की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है—
“अश्वमेधसहस्रं तु राजसूयशतं कलौ।
पदेपदे च लभते द्वारकां याति यो नरः॥”
भावार्थ: कलियुग में जो मनुष्य द्वारका की ओर जाता है, उसके प्रत्येक कदम की महिमा को हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों के फल के तुल्य बताकर स्तुत किया गया है।
इसे पढ़कर यात्रा के वे सारे कदम याद आते हैं।
तब कहाँ मालूम था कि पुराण ने द्वारिका की ओर बढ़ते कदमों तक की इतनी महिमा कही है!
मैं तो केवल अपने कान्हा को देखने जा रहा था।
द्वारिका का स्मरण भी पुण्य
और यदि कोई व्यक्ति द्वारिका तक नहीं पहुँच पाए?
स्कन्द पुराण उसके लिए भी एक सुंदर आशा देता है—
“मनसा चिन्तयेद्यो वै कलौ द्वारवतीं पुरीम्…”
अर्थात कलियुग में जो मनुष्य मन से भी द्वारवती का चिंतन करता है, उसके लिए महान पुण्य का वर्णन किया गया है।
और एक अन्य श्लोक में—
“पश्चिमाशां नरः स्नात्वा कृत्वा वै करसंपुटम्।
द्वारकां ये स्मरिष्यंति तेषां कोटिगुणं फलम्॥”
द्वारका के श्रद्धापूर्वक स्मरण की भी अत्यंत बड़ी महिमा कही गई है।
इसका भाव मुझे बहुत सुंदर लगता है—
भगवान तक पहुँचने के लिए हमेशा शरीर का पहुँचना आवश्यक नहीं।
कभी-कभी मन पहले पहुँच जाता है…
और शरीर को बाद में बुलावा आता है।
माखन के प्रसाद का वह स्वाद…
दर्शन के बाद मिला माखन का प्रसाद।
उसका स्वाद आज भी जैसे मुँह में बसा हुआ है।
लेकिन वह केवल माखन का स्वाद नहीं था।
वह कान्हा की स्मृति थी।
वही कान्हा…
जो कभी गोकुल में माखन चुराते थे।
जिनकी माखन-चोरी पर यशोदा मैया नाराज होती थीं।
जिन्हें भक्त आज भी प्रेम से माखनचोर कहते हैं।
और आज उसी कृष्ण की नगरी में उनके चरणों से मिला माखन…
उसे खाते हुए मन में बस यही लगा—
कान्हा ने माखन नहीं दिया,
अपने बचपन की एक छोटी-सी स्मृति मेरे हाथों में रख दी।
उस प्रसाद की मिठास मुँह से उतर गई होगी…
लेकिन मन से आज तक नहीं उतरी।
जहाँ सभी तीर्थ कृष्ण के सान्निध्य में आते हैं
स्कन्द पुराण में एक अत्यंत सुंदर कथन मिलता है—
“यस्मात्सर्वाणि तीर्थानि सर्वे देवास्तथा मखाः।
द्वारकायां समायांति त्रिकालं कृष्णसंनिधौ॥”
भावार्थ: सभी तीर्थ, देवता और यज्ञ द्वारका में श्रीकृष्ण के सान्निध्य में आते हैं—ऐसी द्वारका की महिमा कही गई है।
और इसके बाद कहा गया है—
“फलं समस्ततीर्थानां दृष्ट्वा द्वारवतीं लभेत्॥”
अर्थात द्वारवती के दर्शन में समस्त तीर्थों के फल की महिमा कही गई है।
कितना सुंदर भाव है—
मनुष्य तीर्थों की यात्रा करता है,
लेकिन द्वारिका ऐसी है जहाँ पुराण स्वयं तीर्थों को कृष्ण के पास आता हुआ देखता है।
द्वारिका से लौट आया… पर मन नहीं
यात्राएँ समाप्त हो जाती हैं।
गाड़ी वापस लौट आती है।
सामान घर पहुँच जाता है।
तस्वीरें मोबाइल में रह जाती हैं।
लेकिन कुछ यात्राएँ वापस आने के बाद शुरू होती हैं।
द्वारिका मेरे लिए ऐसी ही यात्रा है।
आज भी आँखें बंद करता हूँ तो मंदिर की वही कतार दिखाई देती है।
घंटियों की आवाज सुनाई देती है।
द्वारिकाधीश का वह स्वरूप सामने आ जाता है।
और माखन के प्रसाद का स्वाद याद आ जाता है।
तब मन कहता है—
मैं द्वारिका से लौट तो आया…
लेकिन क्या सच में पूरा लौट पाया?
शायद नहीं।
शरीर वापस आया है,
मन आज भी वहीं है।
द्वारिका — कृष्ण के हृदय का द्वार
स्कन्द पुराण यह शब्दशः नहीं कहता कि—
“द्वारिका कृष्ण के हृदय का द्वार है।”
यह मेरा भाव है।
लेकिन जब वही पुराण कहता है—
“आलोड्य सर्वशास्त्राणि पुराणानि पुनःपुनः।
मया दृष्टा महीपाल न द्वारकासमा पुरी॥”
जब वह कृष्णमुख-दर्शन को इतना महान बताता है…
जब द्वारका के स्मरण, यात्रा, गोमती और यहाँ तक कि उसकी धूल की भी महिमा गाता है…
तो मन अपने आप कह उठता है—
द्वारिका कृष्ण के हृदय का द्वार है।
और जिसने एक बार उस द्वार से भीतर झाँक लिया…
जिसने एक बार द्वारिकाधीश को देख लिया…
उसके लिए फिर संसार पहले जैसा नहीं रहता।
मेरे लिए इस पूरी यात्रा का सार केवल इतना है—
मन में बसे द्वारिकाधीश,
अब किसी और को देखने का मन नहीं बचा।
मंदिर की वह कतार याद रहेगी।
कान्हा का वह रूप याद रहेगा।
माखन के प्रसाद का वह स्वाद याद रहेगा।
और जीवन भर एक प्रार्थना रहेगी—
“हे द्वारिकाधीश…
जिस कृपा से एक बार अपने द्वार तक बुलाया,
वही कृपा फिर करना।
फिर बुलाना कान्हा…
क्योंकि मैं द्वारिका से लौट आया हूँ,
लेकिन अपना मन तुम्हारे चरणों में छोड़ आया हूँ।”
🙏🏻 जय श्री द्वारिकाधीश।
🙏🏻 जय श्री कृष्ण।
Jai dwarika dhish