मैं अकेला था, अकेला हूँ… और शायद अकेला ही रह जाऊँ
कभी-कभी इंसान लोगों से नहीं,
उनके चले जाने के बाद बची हुई खामोशी से हार जाता है।
मैं अकेला हूँ…
यह कहना आसान है, लेकिन इस एक वाक्य के पीछे जितनी रातें छिपी हैं, जितने आँसू छिपे हैं, जितनी अधूरी बातें और जितनी यादें दबी हैं—शायद उन्हें कोई कभी समझ नहीं पाएगा।
मैं अकेला था…
अकेला हूँ…
और कभी-कभी डर लगता है कि कहीं अकेला ही न रह जाऊँ।
लोग कहते हैं—“समय सब ठीक कर देता है।”
लेकिन कोई यह नहीं बताता कि समय उन लोगों को वापस नहीं लाता, जिनके बिना हमने जीने की कल्पना ही नहीं की थी।
मैंने भी किसी को चाहा था।
सिर्फ प्यार नहीं किया था…
अपनी पूरी जिंदगी उसके नाम कर दी थी।
जिसके साथ घर बसाने का सपना देखा, जिसके साथ बूढ़ा होने की कल्पना की, जिसके साथ छोटी-छोटी खुशियों में जिंदगी गुजारने की ख्वाहिश थी…
वह मेरे साथ ज्यादा दूर तक नहीं चल सकी।
उसे किसी ने मुझसे छीना नहीं।
भगवान ने उसे अपने पास बुला लिया।
और उस दिन मुझे पहली बार समझ आया कि किसी इंसान को खोना और किसी इंसान के बिना जीना—दो अलग-अलग दर्द हैं।
किसी के जाने पर लोग कहते हैं—
“वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।”
लेकिन कैसे समझाऊँ उन्हें…
वक्त गुजर जाता है, इंसान नहीं।
उसकी याद वहीं रहती है।
कभी किसी गाने में,
कभी किसी खुशबू में,
कभी किसी जगह पर,
कभी किसी तारीख में…
और कभी-कभी तो बिना किसी वजह के भी आँखें भर आती हैं।
फिर जिंदगी ने एक दोस्त दिया।
दोस्त कहना शायद उस रिश्ते के साथ नाइंसाफी होगी।
वह दोस्त नहीं था…
वह मेरे लिए परिवार था।
माँ-बाप के बाद अगर किसी इंसान को मैंने इतना अपना माना, तो वह वही था।
उसके साथ मुझे कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ।
उससे बात करने के लिए कोई वजह नहीं चाहिए थी।
वह मेरी खुशी समझता था, मेरी परेशानी समझता था, मेरी चुप्पी तक समझता था।
और फिर…
भगवान ने उसे भी बुला लिया।
एक-एक करके मेरे अपने लोग मुझसे दूर होते गए।
और मैं हर बार थोड़ा-थोड़ा करके टूटता गया।
शायद इसी वजह से अब किसी को अपना कहने से डर लगता है।
क्योंकि दिल के अंदर एक डर बैठ गया है—
“जिसे अपना बनाऊँगा, कहीं उसे भी खो न दूँ।”
फिर भी इंसान आखिर इंसान है।
दिल कब तक पत्थर बना रहता?
मैंने फिर किसी को अपनी जिंदगी में जगह दी।
सोचा…
शायद अब जिंदगी मुझे भी थोड़ा प्यार देगी।
शायद अब कोई मेरे साथ चलेगा।
शायद अब मेरे हिस्से में भी कोई ऐसा इंसान होगा जिसके सामने मैं अपनी सारी थकान रख सकूँगा।
लेकिन वहाँ भी मुझे वह प्यार नहीं मिला जिसकी मुझे तलाश थी।
और तब एक सवाल ने मुझे अंदर तक हिला दिया—
“क्या मैं हमेशा प्यार के लिए ही तरसता रहूँगा?”
क्या मेरी जिंदगी में कोई ऐसा नहीं होगा जिसे देखकर मुझे यह डर न लगे कि यह भी एक दिन चला जाएगा?
क्या कोई ऐसा नहीं होगा जिसके साथ मैं बिना किसी डर के भविष्य के सपने देख सकूँ?
क्या कोई ऐसा नहीं होगा जो मुझे सिर्फ मेरी जरूरत के समय नहीं, बल्कि मेरी खामोशी में भी याद करे?
मैंने प्यार को कभी शरीर से नहीं जोड़ा।
मेरे लिए प्यार सेक्स नहीं है।
मेरे लिए प्यार है—
किसी का हाल पूछना और सच में उसके जवाब की चिंता करना।
उसके चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपी थकान पहचान लेना।
उसके “मैं ठीक हूँ” में छिपे “मैं ठीक नहीं हूँ” को समझ लेना।
बिना कहे पानी का गिलास आगे कर देना।
भीड़ में भी उसका हाथ पकड़कर यह एहसास दिलाना—
“तुम अकेले नहीं हो।”
मेरे लिए प्यार महंगे तोहफे नहीं है।
प्यार है रात को देर तक बैठकर किसी की बातें सुनना।
प्यार है किसी की परेशानी को अपनी परेशानी समझना।
प्यार है गुस्सा होने के बाद भी रिश्ता बचाने की कोशिश करना।
प्यार है सम्मान।
प्यार है भरोसा।
प्यार है अपनापन।
और सबसे बढ़कर…
प्यार है साथ।
मैं बस इतना चाहता हूँ।
कोई ऐसा मिले जिसके सामने मुझे हर वक्त मजबूत बनने की जरूरत न पड़े।
जिसके सामने मैं कभी बच्चा बन सकूँ।
कभी रो सकूँ।
कभी डर सकूँ।
कभी कह सकूँ—
“आज बहुत थक गया हूँ… मुझे संभाल लो।”
और वह बिना सवाल किए मेरा हाथ पकड़ ले।
मैं चाहता हूँ किसी दिन कोई मेरे पास बैठे।
मेरी आँखों में देखे।
मेरी सारी टूटी हुई कहानियाँ सुने।
मेरे बीते हुए कल से मुझे जज न करे।
और फिर मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बस इतना कहे—
“तुमने बहुत सह लिया…
अब और अकेले मत सहना।
अब मैं हूँ।”
शायद उस एक वाक्य के लिए मैं पूरी जिंदगी इंतजार कर सकता हूँ।
क्योंकि मुझे कोई ऐसा नहीं चाहिए जो दुनिया के सामने मुझे अपना कहे।
मुझे वह चाहिए जो दुनिया के खिलाफ भी मेरा हाथ न छोड़े।
मुझे ऐसा रिश्ता चाहिए जिसमें झगड़े हों, नाराजगी हो, मतभेद हों…
लेकिन छोड़कर जाने की आदत न हो।
जिसमें दोनों में से कोई एक टूटे तो दूसरा उसे जोड़ने की कोशिश करे।
जिसमें जिंदगी चाहे कितनी भी मुश्किल हो जाए, दोनों एक-दूसरे से बस इतना कहें—
“चलो… साथ मिलकर निकाल लेंगे।”
मैं बहुत कुछ खो चुका हूँ।
इसलिए अब किसी को पाना मेरे लिए सिर्फ खुशी नहीं होगा…
वह मेरे लिए जिंदगी का दोबारा मिलना होगा।
शायद इसलिए मेरी चाहत बाकी लोगों से थोड़ी अलग है।
मुझे भीड़ नहीं चाहिए।
मुझे बहुत सारे रिश्ते नहीं चाहिए।
मुझे बस…
एक इंसान चाहिए।
एक ऐसा इंसान जिसके सामने मैं यह कह सकूँ—
“देखो, मैंने जिंदगी में बहुत कुछ खोया है।”
और वह मेरा हाथ और कसकर पकड़कर कहे—
“लेकिन अब मुझे मत खोना।”
मैं उससे यह नहीं कहूँगा कि तुम मेरे बिना जी नहीं सकती।
मैं बस इतना कहूँगा—
“मेरे साथ रहना…
क्योंकि तुम्हारे होने से मुझे जिंदगी थोड़ी कम अकेली लगती है।”
और शायद मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी ख्वाहिश यही है—
किसी दिन रात को सोने से पहले किसी का हाथ अपने हाथ में हो।
कोई पास बैठा हो।
कोई पूछे—
“आज मन इतना उदास क्यों है?”
और मैं पहली बार बिना डर के रो पड़ूँ।
उसके कंधे पर सिर रखकर।
बिल्कुल बच्चे की तरह।
और वह कुछ न कहे…
बस मेरे सिर पर हाथ फेरता रहे।
क्योंकि कभी-कभी इंसान को सलाह नहीं चाहिए होती।
उसे सिर्फ किसी का साथ चाहिए होता है।
और शायद मैं भी इसी साथ के लिए तरस रहा हूँ।
कई बार खुद से पूछता हूँ—
“क्या मेरे हिस्से में कभी वह प्यार आएगा?”
फिर मन चुप हो जाता है।
क्योंकि इतने लोगों को खोने के बाद उम्मीद करना भी डराने लगा है।
लेकिन दिल अभी पूरी तरह मरा नहीं है।
आज भी कहीं न कहीं वह इंतजार कर रहा है…
उस इंसान का…
जो आएगा तो मेरी जिंदगी बदलने के लिए नहीं,
मेरी जिंदगी में रह जाने के लिए आएगा।
जो मुझे यह नहीं बताएगा कि वह मुझसे कितना प्यार करता है…
बल्कि हर दिन अपने व्यवहार से महसूस कराएगा।
और उस दिन शायद मैं उसे देखकर सिर्फ इतना कहूँगा—
“तुम्हें पता है, मैंने तुम्हारा कितने साल इंतजार किया है?”
और शायद वह मुस्कुराकर मेरा हाथ पकड़ ले।
मैं उसकी आँखों में देखूँ…
और पहली बार मेरे अंदर से यह डर निकल जाए कि—
“अब यह भी चला जाएगा।”
उस दिन शायद मेरी आँखों में आँसू होंगे…
लेकिन वे दर्द के नहीं होंगे।
वे इस एहसास के होंगे कि—
जिस इंसान को जिंदगी भर खोजता रहा,
वह आखिरकार मेरे सामने खड़ा है।
और तब शायद मैं भगवान से कोई शिकायत नहीं करूँगा।
क्योंकि तब समझ आ जाएगा कि भगवान ने मुझे प्यार से वंचित नहीं किया था…
बस मेरे हिस्से का प्यार आने में थोड़ी देर कर दी थी।
तब मैं उस इंसान का हाथ पकड़कर धीरे से कहूँगा—
**“मुझे कुछ नहीं चाहिए…
न बड़ी खुशियाँ,
न बड़ी दौलत,
न कोई खूबसूरत दुनिया।
बस तुम मेरे साथ रहना।
क्योंकि मैंने बहुत लोगों को खोया है…
अब किसी अपने को खोने की हिम्मत नहीं बची।
बस इतना वादा करना—
जब मैं चुप रहूँ तब भी मेरा साथ दोगे,
जब मैं टूटूँगा तब भी मेरा हाथ पकड़ोगे,
जब मैं कमजोर पड़ूँगा तब भी मुझे अपना कहोगे…
और अगर कभी जिंदगी बहुत मुश्किल हो जाए,
तो मेरा हाथ छोड़ने के बजाय
मेरा हाथ और कसकर पकड़ लेना।
क्योंकि मैं प्यार नहीं माँग रहा…
मैं बस अपना कोई माँग रहा हूँ।”*
Nice one