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जब एक अजनबी मेरा सबसे अपना बन गया…

By Unknown Writer
August 6, 2026 4 Min Read
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यह कहानी शुरू होती है… साल 2022 से।

साल 2022…

ज़िंदगी अपनी रफ्तार से भाग रही थी।

हर सुबह जिम्मेदारियों के साथ शुरू होती और हर रात अधूरे कामों की थकान के साथ खत्म होती। लोगों की भीड़ बहुत थी, लेकिन दिल की बात सुनने वाला कोई नहीं था।

तभी एक दिन एक अनजान नंबर से फ़ोन आया…

“सर… मुझे आपसे मिलना है।”

मैंने बिना कुछ पूछे ऑफिस का पता बता दिया।

कुछ देर बाद फिर फ़ोन आया…

“सर… ऑफिस नहीं मिल रहा…”

वह लोगों से रास्ता पूछते-पूछते, धूप और थकान से लड़ते हुए आखिर मेरे ऑफिस पहुँची।

दरवाज़ा खुला…

और पहली बार मैंने उस चेहरे को देखा।

न कोई बनावट…

न कोई झिझक…

न कोई दिखावा…

बस एक सादगी, जो सीधे दिल तक उतर गई।

उसने बिना रुके अपनी पूरी बात एक ही साँस में कह दी।

शायद उसी दिन पहली बार महसूस हुआ कि कुछ लोग अपनी पहचान बताकर नहीं, अपने व्यवहार से दिल में जगह बना लेते हैं।

मैंने उसी दिन उसे काम सौंप दिया।

मुझे लगा था…

दो-चार दिन काम करेगी और फिर बाकी लोगों की तरह चली जाएगी।

लेकिन मुझे कहाँ पता था कि यह इंसान एक दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन जाएगा।

…

शुरुआत में हमारा रिश्ता सिर्फ़ काम तक सीमित था।

फिर धीरे-धीरे काम से बातें होने लगीं…

बातों से भरोसा…

और भरोसे से ऐसा अपनापन, जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता।

वह मेरी टीम का हिस्सा नहीं रही…

मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गई।

कभी माँ बनकर डाँटती…

कभी दोस्त बनकर हँसाती…

कभी छोटी-सी बात पर नाराज़ हो जाती…

और अगले ही पल ऐसे बात करती जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

जब पूरी दुनिया मुझे मजबूत समझती थी…

वह मेरी कमजोरी भी देख लेती थी।

मैं हँसता था…

लेकिन वह मेरी आँखों की थकान पढ़ लेती थी।

मैं कहता…

“कुछ नहीं हुआ…”

और वह मुस्कुराकर कहती…

“झूठ मत बोलिए… क्या बात है?”

उसके सामने झूठ बोलना कभी आया ही नहीं।

क्योंकि वह शब्द नहीं…

खामोशी पढ़ती थी।

…

ज़िंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है।

अपने बदलते देखे…

रिश्ते टूटते देखे…

मतलब के लोग आते-जाते देखे…

लेकिन पहली बार किसी ऐसे इंसान को देखा…

जिसे मेरे नाम से नहीं…

मेरे होने से प्यार था।

उसे मेरे पैसे से मतलब नहीं था…

मेरी पहचान से नहीं…

मेरे पद से नहीं…

अगर किसी चीज़ से मतलब था…

तो सिर्फ़ मेरी मुस्कुराहट से।

मेरी खुशी उसकी खुशी थी…

और मेरा दर्द…

उसकी बेचैनी।

…

कुछ समय पहले वह एक गंभीर संक्रमण से जूझ रही थी।

रातों की नींद उसकी उड़ी हुई थी…

लेकिन आँखों में नींद मेरी भी नहीं थी।

दर्द उसके शरीर में था…

लेकिन बेचैनी मेरे दिल में।

जब वह कहती…

“मैं ठीक हूँ…”

तो मुझे पता होता…

वह सिर्फ़ मुझे परेशान नहीं करना चाहती।

उसके ठीक होने की दुआ शायद उससे ज़्यादा मैंने माँगी होगी।

क्योंकि पहली बार किसी और का दर्द…

मेरे अपने दर्द से बड़ा लगने लगा था।

…

आज भी हमारी एक आदत नहीं बदली।

मैं जब किसी बात पर कहता हूँ—

“मैं पूछ नहीं रहा… बता रहा हूँ।”

तो उसके चेहरे पर आने वाली वह छोटी-सी मुस्कान…

मेरे पूरे दिन की सबसे बड़ी खुशी बन जाती है।

…

आज अगर कोई मुझसे पूछे…

“तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत क्या है?”

तो मैं किसी उपलब्धि का नाम नहीं लूँगा।

मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा…

“वो है ना…”

बस…

इतना कहना ही काफी होगा।

…

लेकिन…

ज़िंदगी का सबसे बड़ा डर मौत नहीं होती…

सबसे बड़ा डर होता है…

उस इंसान को खो देना…

जो तुम्हारी वजह से मुस्कुराता हो…

और जिसकी वजह से तुम जीना सीख गए हो।

मैंने ज़िंदगी में बहुत कुछ खोया है।

कुछ अपने…

कुछ सपने…

कुछ रिश्ते…

और हर बार खुद को समझा लिया कि सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन अब…

अगर कभी भगवान मुझसे मेरी सबसे कीमती चीज़ माँग लें…

तो शायद पहली बार मैं उनसे लड़ जाऊँ।

क्योंकि अब उसे खोने की हिम्मत नहीं बची।

कई बार रात को अचानक नींद खुल जाती है…

और मन में एक ही सवाल आता है…

“अगर एक दिन वह मेरी ज़िंदगी में नहीं रही तो…?”

बस…

यहीं सोचकर दिल काँप उठता है।

फिर खुद को समझाता हूँ…

नहीं…

ऐसा कभी मत सोचना।

क्योंकि कुछ लोग किस्मत से नहीं मिलते…

भगवान उन्हें ज़िम्मेदारी बनाकर भेजते हैं।

…

अगर मेरी आँखों से कभी आँसू निकले हैं…

तो दुनिया से पहले मैंने उसे बताया है।

क्योंकि मुझे पता है…

वह मेरे आँसू पोंछने से पहले…

उनकी वजह पूछेगी।

अगर मैं गलत हूँ…

तो डाँटेगी।

अगर मैं टूट रहा हूँ…

तो संभालेगी।

अगर मैं हार रहा हूँ…

तो मेरा हाथ पकड़कर कहेगी—

“मैं हूँ ना…”

और सच कहूँ…

कभी-कभी पूरी दुनिया का साथ भी उस एक वाक्य के आगे छोटा पड़ जाता है।


और अगर कभी…

कभी ऐसा दिन आया…

जब हम दोनों साथ न हों…

समय हमें अलग रास्तों पर ले जाए…

या ज़िंदगी की मजबूरियाँ हमें दूर कर दें…

तो शायद लोग यही कहेंगे—

“वो तो सिर्फ़ दोस्त थे…”

लेकिन उन्हें क्या पता…

कुछ रिश्ते दोस्ती से बड़े होते हैं…

और मोहब्बत से भी ज़्यादा पवित्र।

वे आत्मा में बस जाते हैं…

जहाँ दूरी नहीं पहुँचती।

…

अगर मेरी ज़िंदगी एक किताब है…

तो उसमें सबसे खूबसूरत अध्याय 2022 है।

क्योंकि उसी साल एक अजनबी ने दरवाज़ा खटखटाया था…

और बिना बताए…

मेरे दिल में हमेशा के लिए घर बना लिया।

आज भी भगवान से एक ही दुआ करता हूँ…

अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज़ सच में होती है…

तो रिश्ता चाहे कोई भी देना…

लेकिन उसे फिर से मेरी ज़िंदगी में ज़रूर भेजना।

क्योंकि कुछ लोग सिर्फ़ इंसान नहीं होते…

वे भगवान की भेजी हुई दुआ होते हैं।

और अगर कभी मेरी आख़िरी साँस आए…

तो मेरी आख़िरी ख्वाहिश बस इतनी होगी…

कि उस दिन भी मेरी आवाज़ सुनकर वही मुस्कुराकर कहे—

“डरिए मत… मैं हूँ ना…”

शायद उस पल…

मौत भी हार जाए…

क्योंकि इंसान शरीर से नहीं…

यादों से ज़िंदा रहता है।

और मेरी हर याद में…

सिर्फ़ वही होगी…

वह अजनबी…

जो 2022 में मेरी ज़िंदगी में आया था…

और धीरे-धीरे मेरी पूरी ज़िंदगी बन गया।

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Unknown Writer

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