डांडिया रास: माँ की आराधना या मनोरंजन की आड़ में मर्यादाओं का पतन?
जिस पर्व का उद्देश्य माँ शक्ति की आराधना करना था, क्या वह कहीं केवल दिखावे और मनोरंजन तक सीमित होता जा रहा है? जिस आँगन में माँ के जयकारे गूँजने चाहिए, वहाँ यदि अश्लील गीतों और अभद्र व्यवहार को स्थान मिलने लगे, तो हमें अपनी परंपराओं के मूल उद्देश्य पर विचार अवश्य करना चाहिए।
नवरात्रि केवल नौ रातों का उत्सव नहीं, बल्कि माँ दुर्गा की उपासना, आत्मशुद्धि और अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करने का अवसर है। इन नौ दिनों में कोई व्रत रखता है, कोई दुर्गासप्तशती का पाठ करता है, कोई मंदिर में दीप जलाता है, तो कोई माँ के सामने हाथ जोड़कर अपने परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करता है। हर भक्त की आराधना का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन उसके केंद्र में श्रद्धा और समर्पण का भाव होता है।
इसी धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण में गरबा और डांडिया रास की परंपरा भी विशेष स्थान रखती है। गुजरात की लोकसंस्कृति से जुड़ा यह नृत्य संगीत, सामूहिकता और उत्साह की सुंदर अभिव्यक्ति है। पारंपरिक गरबा में दीप या गरबी के चारों ओर नृत्य किया जाता है, जबकि डांडिया रास में हाथों में डंडियाँ लेकर लयबद्ध नृत्य होता है। इन परंपराओं के साथ देवी शक्ति की आराधना और श्रीकृष्ण की रास परंपरा के सांस्कृतिक संबंध भी मिलते हैं।
समय के साथ इन आयोजनों का स्वरूप बदला है। बड़े-बड़े मंच, आधुनिक संगीत, आकर्षक रोशनी और भव्य आयोजन इस उत्सव का हिस्सा बन गए हैं। परिवर्तन अपने आप में गलत नहीं है। प्रश्न तब उठता है, जब उत्सव का बाहरी आकर्षण उसकी मूल भावना पर भारी पड़ने लगे।
जब भक्ति के मंच पर दिखावा हावी होने लगे
आज कुछ डांडिया आयोजनों में ऐसे गीत सुनाई देते हैं, जिनके शब्द धार्मिक उत्सव की गरिमा के अनुरूप नहीं होते। कहीं अश्लील इशारों और प्रस्तुतियों को मनोरंजन का नाम दिया जाता है, तो कहीं दूसरों का ध्यान आकर्षित करने की होड़ में नृत्य की सांस्कृतिक गरिमा पीछे छूट जाती है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है, जब किसी महिला पर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं, उसकी अनुमति के बिना तस्वीरें या वीडियो बनाए जाते हैं अथवा नृत्य और भीड़ की आड़ में अनुचित स्पर्श या छेड़छाड़ की जाती है।
ऐसी घटनाओं पर प्रश्न उठाना किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विरोध करना नहीं है। आधुनिक कपड़े पहनना, सुंदर दिखना या अपनी पसंद से नृत्य करना अश्लीलता नहीं है। वास्तविक समस्या वह व्यवहार है, जिसमें किसी की गरिमा, सहमति और सुरक्षा की अनदेखी की जाती है।
जिस उत्सव में माँ शक्ति की आराधना होती है, वहाँ किसी महिला को अपमानित या असुरक्षित महसूस होना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी पर प्रश्न खड़ा करता है।
यह भी आवश्यक है कि हम सभी आयोजनों को एक ही दृष्टि से न देखें। आज भी अनेक स्थानों पर गरबा और डांडिया पूरी श्रद्धा, पारिवारिक सहभागिता और सांस्कृतिक सम्मान के साथ मनाए जाते हैं। आलोचना उन गतिविधियों की होनी चाहिए, जो वास्तव में मर्यादा का उल्लंघन करती हैं।
शास्त्रों का संदेश: आराधना के साथ आचरण भी आवश्यक
मार्कण्डेय पुराण में समाहित देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गासप्तशती भी कहा जाता है, देवी की महिमा और अधर्म पर धर्म की विजय का वर्णन करता है। देवी की उपासना हमें शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती है।
देवी की स्तुति में कहा गया है—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
अर्थात जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
इस स्तुति का भाव हमें शक्ति के प्रति सम्मान और उसके व्यापक स्वरूप का स्मरण कराता है। यदि हम माँ दुर्गा को शक्ति का प्रतीक मानकर उनकी पूजा करते हैं, तो अपने व्यवहार में भी सम्मान, संवेदनशीलता और न्याय को स्थान देना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अहिंसा, विनम्रता, सरलता और आत्मसंयम जैसे गुणों को आध्यात्मिक जीवन के महत्वपूर्ण अंगों के रूप में बताया है (भगवद्गीता 13.7)।
इन शिक्षाओं का भाव स्पष्ट है—धार्मिकता केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि हमारे आचरण से भी प्रकट होती है। हालाँकि शास्त्रों में आज के आधुनिक डांडिया आयोजनों के प्रत्येक स्वरूप के लिए अलग-अलग नियम नहीं दिए गए हैं, फिर भी उनके नैतिक संदेश हमें अपने व्यवहार पर विचार करने की प्रेरणा देते हैं।
उत्सव की स्वतंत्रता और मर्यादा, दोनों आवश्यक हैं
नवरात्रि में नाचना, गाना, सजना-सँवरना और आनंद मनाना गलत नहीं है। उत्सव लोगों को जोड़ते हैं, लोककलाओं को जीवित रखते हैं और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हैं।
लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि किसी दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन किया जाए। मनोरंजन का अर्थ यह नहीं कि अश्लीलता को सामान्य मान लिया जाए। और धार्मिक आयोजन का अर्थ केवल माँ की तस्वीर लगाकर कार्यक्रम आयोजित कर देना भी नहीं है।
आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे संगीत और प्रस्तुतियों के चयन में विवेक रखें, छेड़छाड़ के विरुद्ध स्पष्ट नियम बनाएँ और शिकायत मिलने पर उचित कार्रवाई करें। प्रतिभागियों की जिम्मेदारी है कि वे दूसरों की सहमति और गरिमा का सम्मान करें। समाज की जिम्मेदारी है कि वह अनुचित व्यवहार को प्रोत्साहित करने के बजाय उसका विरोध करे।
संस्कृति की रक्षा केवल परंपराओं का नाम लेने से नहीं होती; वह तब होती है, जब हम उनके भीतर निहित मूल्यों को अपने जीवन में उतारते हैं।
निष्कर्ष: माँ के नाम पर उत्सव हो, तो आचरण में भी सम्मान दिखाई दे
नवरात्रि हमें अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करने और शक्ति, साहस तथा सदाचार को अपनाने की प्रेरणा देती है। इसलिए यह अवसर केवल उत्सव मनाने का ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार पर आत्मचिंतन करने का भी है।
यदि डांडिया के मंच पर संगीत हो, तो उसमें हमारी लोकसंस्कृति की गरिमा भी हो। यदि नृत्य हो, तो उसमें आनंद के साथ पारस्परिक सम्मान भी हो। यदि हजारों लोग माँ के जयकारे लगाने के लिए एकत्र हों, तो वहाँ हर व्यक्ति की सुरक्षा और स्वतंत्रता का भी ध्यान रखा जाए।
हमें किसी के पहनावे के आधार पर उसकी भक्ति नहीं आँकनी चाहिए, बल्कि अपने आचरण से यह दिखाना चाहिए कि हमारी आस्था हमें दूसरों का सम्मान करना सिखाती है।
माँ की आराधना का अर्थ केवल उनके सामने सिर झुकाना नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में भी सम्मान, संयम और सद्भाव को स्थान देना है।
आइए, इस नवरात्रि डांडिया भी खेलें, गरबा भी करें और खुशियाँ भी मनाएँ—लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत की गरिमा और एक-दूसरे के सम्मान को कभी पीछे न छोड़ें।
क्योंकि उत्सव की वास्तविक सुंदरता केवल रोशनी से सजे मंच में नहीं, बल्कि उस सम्मान और सद्भाव में है, जो वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति को महसूस हो।
जय माता दी!
Nice