वह सिर्फ़ प्यार चाहता था
शादी के बाद उसने अपनी पत्नी को सिर्फ़ पत्नी नहीं माना था।उसने उसे अपना घर माना था।उसकी सुबह पत्नी के चेहरे से शुरू होती थी और रात उसके हाल पूछकर खत्म।पत्नी खुश होती तो उसे लगता जैसे उसकी दुनिया पूरी है।पत्नी उदास होती तो वह खुद बेचैन हो जाता।उसने कभी हिसाब नहीं रखा कि उसने पत्नी के लिए क्या-क्या किया।उसने बस निभाया।बीमारी में उसके सिरहाने बैठा।उसकी पसंद की चीजें बिना पूछे घर ले आया।उसके गुस्से को भी प्यार समझकर सहता रहा।कई बार खुद परेशान होते हुए भी उसके सामने मुस्कुराता रहा।उसे बदले में कुछ बड़ा नहीं चाहिए था।बस कभी पत्नी खुद उसके पास आकर कह देती—”आज तुम्हारे बिना मन नहीं लगा।”बस कभी उसके कंधे पर सिर रख देती।बस कभी बिना किसी वजह उसके हाथ को पकड़कर कह देती—”तुम मेरे हो।”लेकिन शायद उसकी किस्मत में ये छोटे-छोटे सुख भी नहीं थे।जब भी वह पत्नी के करीब जाता, पत्नी दूर हो जाती।जब वह उसका हाथ पकड़ता, वह कहती—”तुम्हें हमेशा यही सब क्यों चाहिए?”जब वह उसे गले लगाना चाहता, जवाब मिलता—”तुम्हारी नजर में प्यार का मतलब सिर्फ़ physical होना है।”वह कुछ पल उसे देखता रहता।फिर अपना हाथ वापस खींच लेता।और धीरे से कहता—”नहीं… मुझे तुम्हारा शरीर नहीं चाहिए। मुझे तुम्हारा अपनापन चाहिए।”लेकिन उसकी बात कभी पूरी तरह समझी नहीं गई।एक रात वह बहुत देर तक पत्नी के पास बैठा रहा।कमरे में अंधेरा था।पत्नी सो रही थी।वह उसे देखता रहा।उसने सोचा—”जिस इंसान को मैं अपनी पूरी दुनिया मानता हूँ, क्या उसकी दुनिया में मेरा कोई कोना भी है?”उसकी आँखों में आँसू आ गए।उसने पत्नी को जगाया नहीं।बस धीरे से उसके बालों को देखा और मन ही मन कहा—”काश… तुम एक बार मेरी आँखों में देखकर समझ पाती कि मैं तुम्हारे पास अपनी जरूरत लेकर नहीं, अपना दिल लेकर आता हूँ।”अगली सुबह भी उसने वही किया जो हमेशा करता था।चाय बनाई।नाश्ता रखा।पत्नी से पूछा—”कुछ चाहिए?”और पत्नी ने हमेशा की तरह बस कहा—”नहीं।”उसे उस दिन पहली बार लगा कि शायद उसकी जिंदगी में सबसे ज्यादा बोला जाने वाला शब्द यही है—”नहीं।”प्यार चाहिए?नहीं।पास बैठना है?नहीं।गले लगाना है?नहीं।दिल की बात करनी है?अभी नहीं।और वह हर “नहीं” के साथ थोड़ा-थोड़ा मरता गया।फिर एक दिन उसने कोशिश करना बंद कर दिया।पत्नी ने देखा कि अब वह पास नहीं आता।अब वह प्यार के लिए नहीं पूछता।अब वह शिकायत नहीं करता।अब वह यह भी नहीं पूछता—”तुम मुझसे प्यार करती हो ना?”वह बस चुप रहने लगा।इतना चुप कि घर की दीवारें भी उसकी खामोशी सुनने लगीं।एक दिन पत्नी ने पूछा—”तुम इतने शांत क्यों रहते हो?”वह मुस्कुराया।”कुछ नहीं… अब समझ आ गया है कि जहाँ प्यार माँगना पड़े, वहाँ चुप रहना ही बेहतर है।”पत्नी ने बात को सामान्य समझकर छोड़ दिया।लेकिन वह आदमी अंदर से बहुत दूर जा चुका था।रात को वह अकेला बैठकर पुराने फोटो देखता।एक तस्वीर पर उसकी नजर रुक गई।उसमें पत्नी उसके कंधे पर सिर रखकर मुस्कुरा रही थी।वह तस्वीर सीने से लगाकर रो पड़ा।उसने कहा—”मुझे ये तस्वीर नहीं चाहिए थी… मुझे वो पल चाहिए था।मुझे तुम्हारा चेहरा नहीं चाहिए था… मुझे तुम्हारे दिल में अपनी जगह चाहिए थी।”उसकी आवाज टूट गई।”मैंने कभी तुम्हें सिर्फ़ छूना नहीं चाहा… मैं तुम्हें महसूस करना चाहता था।मैं तुम्हारे शरीर के पास नहीं, तुम्हारी आत्मा के पास बैठना चाहता था।लेकिन तुमने मेरे हर स्पर्श को मेरी जरूरत समझा और मेरे हर प्यार को मेरी कमजोरी।”उस रात उसका अकेलापन इतना गहरा हो गया कि उसे अपनी जिंदगी बेकार लगने लगी।उसे लगा—”जिस इंसान के लिए मैं जीता रहा, उसी के पास मेरे जीने की कोई वजह नहीं बची।”और वह खुद को खत्म करने की सोचने लगा।लेकिन जाने से पहले उसने पत्नी के लिए एक आखिरी कागज छोड़ा।उसमें लिखा था—”मैं तुमसे नाराज होकर नहीं जा रहा।मैं तुम्हें दोष देकर भी नहीं जा रहा।मैं बस बहुत थक गया हूँ।हर बार जब मैं तुम्हारे पास प्यार लेने आया, तुमने मेरी जरूरत देखी।हर बार जब मैंने तुम्हें गले लगाना चाहा, तुमने मेरी नीयत देखी।हर बार जब मैंने अपना दिल तुम्हारे सामने रखा, तुमने उसमें सिर्फ़ शरीर की चाहत खोजी।काश तुम एक बार समझ पातीं…आदमी जब अपनी पत्नी के पास जाता है तो हर बार उसे शरीर नहीं चाहिए होता।कभी-कभी उसे सिर्फ़ यह यकीन चाहिए होता है कि दुनिया में कोई ऐसा इंसान है जिसके पास लौटकर वह अपने सारे दुख भूल सकता है।मुझे तुम्हारा शरीर कभी नहीं चाहिए था।मुझे तुम्हारा ‘अपना’ होना चाहिए था।मैंने तुम्हें पाने की कोशिश नहीं की…मैंने तुम्हारे दिल में अपनी जगह पाने की कोशिश की थी।लेकिन शायद मैं हार गया।”कागज पर आखिरी शब्दों के नीचे आँसू के निशान थे।और शायद वही आँसू उसकी पूरी जिंदगी की कहानी कह रहे थे।क्योंकि वह आदमी प्यार में हारा नहीं था।वह प्यार माँगते-माँगते थक गया था।और रिश्ते की सबसे बड़ी त्रासदी यही होती है—जब सामने वाला इंसान हमारे पास खड़ा होकर भी हमें अकेला महसूस करवा दे।जब कोई हमारे साथ रहते हुए भी हमारे दिल को यह यकीन न दिला पाए कि—”तुम मेरे लिए जरूरी हो।”उस आदमी को महंगे तोहफे नहीं चाहिए थे।उसे कोई बड़ी ख्वाहिश नहीं थी।उसे बस कभी पत्नी के हाथों से अपना चेहरा पकड़कर यह सुनना था—”तुम्हें मुझसे प्यार चाहिए ना?तो आओ… आज मेरे पास बैठो।आज मैं तुम्हें सिर्फ़ प्यार दूँगी।”शायद उस एक वाक्य ने उसकी पूरी जिंदगी बदल देनी थी।लेकिन वह वाक्य कभी आया ही नहीं।और एक इंसान…जो जिंदगी भर अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर उसे संभालता रहा,आखिर में अपने ही दर्द को संभाल नहीं पाया।कभी-कभी किसी इंसान को मारने के लिए उसे धक्का देने की जरूरत नहीं होती।बस उसके प्यार को बार-बार ठुकराते रहिए…और उसे यह महसूस करा दीजिए कि उसके होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।फिर देखिए—एक दिन वह इंसान बोलना बंद कर देगा।और उस दिन शायद बहुत देर हो चुकी होगी।**
Nice one