आसमान में चाँद था, लेकिन उसकी रोशनी से ज़्यादा चमक एक बूढ़े गुरु की आँखों में थी। उनके सामने उनका शिष्य बैठा था, जो जीवन में बड़ा आदमी बनना चाहता था।
गुरु ने धीरे से पूछा—
“बेटा, जिंदगी में दोस्त कैसे बनाने चाहिए?”
शिष्य ने बिना सोचे उत्तर दिया—
“जो मुझसे बड़े हों, ताकतवर हों, ताकि लोग मुझे भी बड़ा समझें।”
गुरु मुस्कुराए…
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस शिष्य का हाथ पकड़कर उसे जंगल में ले गए।
एक विशाल आम का पेड़ फलों से लदा हुआ खड़ा था। उसके पास कई छोटे-छोटे पौधे थे।
गुरु ने ज़मीन से एक पत्थर उठाया और पूछा—
“बताओ… यह पत्थर किस पर फेंका जाएगा?”
शिष्य बोला—
“फलों से लदे इस बड़े पेड़ पर।”
गुरु ने पत्थर वापस ज़मीन पर रख दिया और कहा—
“याद रखना… दुनिया कभी सूखे पेड़ों पर पत्थर नहीं फेंकती। पत्थर हमेशा उसी पर फेंके जाते हैं, जिसके पास फल होते हैं।”
कुछ पल की खामोशी के बाद गुरु की आवाज़ फिर गूँजी—
“दोस्त चाहे बराबरी का हो या तुमसे छोटे स्तर का, कोई फर्क नहीं पड़ता। दोस्ती दिल से होती है, हैसियत से नहीं। लेकिन अगर कभी दुश्मन बनाना पड़े… तो वह ऐसा होना चाहिए जिसका कद तुमसे बड़ा हो। क्योंकि इंसान की पहचान उसके दोस्तों से नहीं, उसके दुश्मनों से होती है।”
वर्ष बीत गए…
शिष्य ने मेहनत की…
ईमानदारी से जीया…
लोगों की मदद की…
और धीरे-धीरे उसका नाम इतना बड़ा हो गया कि शहर के सबसे ताकतवर लोग उसके खिलाफ खड़े हो गए।
उस पर झूठ बोले गए…
उसे बदनाम किया गया…
उसके रास्ते रोके गए…
उसके अपनों को उससे दूर कर दिया गया…
वह हर रात टूटता था…
लेकिन हर सुबह फिर खड़ा हो जाता था।
एक दिन उसने आईने में खुद को देखा…
आँखों में आँसू थे…
लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।
उसे गुरु की बात याद आ गई।
“जब छोटे लोग तुम्हारे खिलाफ हों, तो समझो विवाद है… लेकिन जब बड़े लोग तुम्हें रोकने लगें, तो समझ लेना कि तुम्हारा वजूद उन्हें बेचैन करने लगा है।”
उस दिन उसने एक और बात समझी…
इतिहास में हर नाम इसलिए बड़ा नहीं होता कि उसने जीत हासिल की… कई नाम इसलिए भी बड़े हो जाते हैं क्योंकि उनका सामना किससे हुआ।
उसने लोगों से कहा—
“राम और रावण का युद्ध केवल अच्छाई और बुराई का युद्ध नहीं था। रावण के कर्म अधर्मपूर्ण थे, इसलिए उसका अंत निश्चित था। लेकिन यह भी सत्य है कि उसने अपना वैर किसी साधारण राजा से नहीं, स्वयं त्रिभुवनपति भगवान श्रीराम से किया। उसी कारण उसका नाम भी युगों तक स्मरण में रहा। यह उसके कर्मों का सम्मान नहीं, बल्कि इस सत्य का प्रमाण है कि प्रतिद्वंद्वी का कद भी इतिहास में पहचान का हिस्सा बन जाता है।”
फिर उसने अपनी मुट्ठी बाँधी और कहा—
“अगर तुम्हें गिराने के लिए छोटे लोग काफी हैं, तो समझो तुम अभी छोटे हो… लेकिन जिस दिन तुम्हें रोकने के लिए बड़े-बड़े लोग एक हो जाएँ, उस दिन समझ लेना कि तुम्हारी ऊँचाई उनकी पहुँच से बाहर होने लगी है।”
और अंत में उसकी आँखों से एक आँसू गिरा…
वह मुस्कुराया…
और बोला—
“दोस्त तुम्हें सुकून देते हैं… लेकिन दुश्मन तुम्हें इतिहास देते हैं।
दोस्त तुम्हारे साथ चलते हैं… लेकिन दुश्मन दुनिया को बताते हैं कि तुम कितनी दूर निकल चुके हो।
याद रखना… चिराग को बुझाने के लिए हवा नहीं, तूफ़ान भेजे जाते हैं… और तूफ़ान हमेशा उसी चिराग की तलाश करते हैं जिसकी रोशनी सबसे दूर तक दिखाई देती है।”
इसलिए कभी अपने दुश्मनों से मत डरना…
डरना उस दिन, जिस दिन तुम्हारे विरोध में कोई खड़ा ही न हो।
क्योंकि इसका अर्थ होगा कि तुमने अभी तक इतना ऊँचा उड़ना शुरू ही नहीं किया कि किसी की आँखों में चुभ सको।
औकात तालियों से नहीं मापी जाती… औकात उससे मापी जाती है कि तुम्हें गिराने के लिए कितनी बड़ी ताकतें अपनी पूरी शक्ति लगा रही हैं।
और इतिहास… इतिहास हमेशा उन्हीं के नाम याद रखता है जिनके सामने खड़े होने से भी बड़े लोग डरते थे।
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Show CommentsNice one
Bahut acchi h
यह आलेख आत्मविश्वास, संघर्ष और व्यक्तित्व की दृढ़ता का प्रेरक संदेश देता है। गुरु–शिष्य संवाद के माध्यम से यह समझाने का सुंदर प्रयास किया गया है कि फलदार वृक्ष पर ही पत्थर पड़ते हैं, अर्थात जो व्यक्ति समाज में सार्थक कार्य करता है, उसे आलोचना और विरोध का सामना भी करना पड़ता है।
साथ ही, इस विचार को विवेक के साथ समझना आवश्यक है कि हर विरोध महानता का प्रमाण नहीं होता। किसी व्यक्ति का मूल्य उसके शत्रुओं की संख्या या शक्ति से नहीं, बल्कि उसके सत्य, चरित्र, विनम्रता, सेवा, ईमानदारी और कर्मों से निर्धारित होता है। यदि बड़े लोग किसी का विरोध करें, तो यह आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति सदैव सही ही हो; इसलिए आत्ममंथन और सत्य के मार्ग पर बने रहना भी उतना ही आवश्यक है।
Wow..What a truly inspiring story. It filled my heart with hope and motivation.
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