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काव्य

देह पर नेह की निशानी

By Jyoti Swami
August 4, 2026 1 Min Read
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देह पर नेह की शेष कुछ तो निशानी होती है।
पारिजात से सुन्दर मेरे पिया, देह पर
नेह की शेष कुछ तो निशानी होती है।

जिन्दगी में नेह से प्यारा कुछ नहीं होता,
बस एक मन की भाव भरी पाती है।

जो है आपके स्वयं के हमेशा पास,
हृदय में रखने की कोशिश भर होती है।

नेह वर्षा तो मानो हार सिंगार की तरह,
जो तन के सब रोग मिटाती जाती है।

मन के विषम विचारों को तजकर ,
उपवन में भी सुन्दर फूल खिलाती है।

ये नेह रूप का श्रृंगार बन के कभी,
हृदय की मधुर रसभार बन जाती है।

आग और पिया मिलन की साँस बन,
राधे रास सी तड़प भी बन जाती है।

ग्रह-नक्षत्र भी परिवर्तित होते जाते,
ये ऋतुयें हरदम बदलती जाती है।

नेह अवस्था भी कभी खत्म न होती,
बस अपना रूप बदलती जाती है।

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Jyoti Swami

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