जब कान्हा खुद चलकर दर्शन देने आए…

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When Lord Krishna Came Himself to Fulfill a Devotee’s Unspoken Wish

कल मंदिर में मेरे नन्हे से कान्हा के दर्शन हुए थे…

पता नहीं क्यों, उन्हें देखते ही दिल भर आया।
मन किया कि बस उन्हें अपनी गोद में उठा लूँ…
अपने लाला को सीने से लगा लूँ…
उनके उस नन्हे से चेहरे को जी भरकर निहारूँ…
उनकी मासूम मुस्कान को अपनी आँखों में हमेशा के लिए बसा लूँ।

लेकिन चाहकर भी उस दिन
मेरी यह छोटी-सी इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

मैंने किसी से शिकायत नहीं की…
किसी से कुछ कहा भी नहीं…

बस मन ही मन अपने कान्हा से इतना ही कहा—

“लाला… आज तुम्हें गोद में लेने का मन था…
पर शायद मेरी गोद में तुम्हारा आना आज लिखा ही नहीं था।”

फिर रात बीत गई…

लेकिन शायद मेरी वो बात
मेरे कान्हा के कानों तक पहुँच गई थी।

आज नंदोत्सव के पावन अवसर पर
जब वही नन्हे कान्हा
किसी भक्त की गोद में सवार होकर
मेरे सामने आए…

तो सच मानिए…
मेरी आँखें नम हो गईं।

एक पल को लगा जैसे मेरा लाला मुझसे कह रहा हो—

“कल तुम मुझे अपनी गोद में नहीं उठा पाई थीं ना…
मैंने तुम्हारी वो अधूरी इच्छा देख ली थी।
इसलिए आज मैं खुद तुम्हारे पास चला आया हूँ।”

उस पल समझ आया…

कान्हा से किया हुआ प्रेम कभी अधूरा नहीं रहता।

हम सोचते हैं कि हम भगवान को देखने मंदिर जाते हैं…
लेकिन कई बार भगवान ही
हमारी आँखों की प्यास बुझाने हमारे पास चले आते हैं।

हम सोचते हैं कि हमने कान्हा को पुकारा है…
लेकिन सच तो यह है कि
हमारे पुकारने से पहले ही कान्हा हमारे भाव सुन लेते हैं।

कल मैं अपने लाला को गोद में लेना चाहती थी…

और आज ऐसा लगा जैसे
कान्हा ने ही मुझे अपनी कृपा की गोद में उठा लिया।

शायद यही तो यशोदा के कान्हा का प्रेम है…

वो यह नहीं देखते कि
किसने कितनी बड़ी पूजा की,
किसने कितने फूल चढ़ाए,
किसने कितने मंत्र पढ़े…

वो तो बस इतना देखते हैं—

किसके दिल में उनके लिए कितना सच्चा भाव है।

और अगर भाव सच्चा हो…

तो कान्हा रास्ते नहीं देखते,
समय नहीं देखते,
बुलावे का इंतज़ार नहीं करते…

बस चले आते हैं।

कभी किसी मूर्ति में,
कभी किसी बच्चे की मुस्कान में,
कभी किसी भजन की धुन में,
कभी किसी अनजान व्यक्ति के रूप में…

और कभी-कभी तो
हमारी आँखों में उतरकर ही कह देते हैं—
“मैं यहीं हूँ… तुम्हारे पास।”

आज नंदोत्सव पर मेरे कान्हा ने
मेरी कल की अधूरी इच्छा पूरी कर दी।

मैं उन्हें अपनी गोद में नहीं उठा पाई थी…

लेकिन आज उन्होंने खुद मेरे मन को
अपनी बाँहों में भर लिया।

लाला… अब और क्या माँगूँ तुमसे?

बस जब भी मन उदास हो,
जब भी आँखों में आँसू हों,
जब भी लगे कि कोई मेरी बात नहीं समझ रहा…

तब ऐसे ही चुपके से चले आना।

क्योंकि दुनिया भले ही
हमारे शब्द न समझ पाए…

मेरे कान्हा…
तुम तो हमारी खामोशी भी समझ लेते हो।

नंद के आनंद भयो,
जय कन्हैया लाल की!
🙏🌸

— ज्योति स्वामी

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