क्या इलाज में कमी रही थी?
एक ऐसा सवाल, जिसने एक आदमी से उसकी बची हुई जिंदगी भी छीन ली…
रात के करीब दो बज रहे थे।
अस्पताल की लंबी गलियारे में सफेद रोशनी जल रही थी।
चारों तरफ एक अजीब-सी खामोशी थी।
कहीं किसी मशीन की आवाज़…
कहीं किसी मरीज की कराह…
और उन सबके बीच एक आदमी ICU के बाहर कुर्सी पर बैठा था।
उसकी आँखें लाल थीं।
कई रातों से ठीक से सोया नहीं था।
हाथ में पत्नी की रिपोर्ट थी, लेकिन अब वह रिपोर्ट पढ़ नहीं रहा था।
वह सिर्फ दरवाजे को देख रहा था।
उस दरवाजे के पीछे उसकी पूरी दुनिया सांस ले रही थी।
उसकी पत्नी।
जिसके साथ उसने जिंदगी बिताने के सपने देखे थे।
जिसके साथ उसने आने वाले कल की योजनाएँ बनाई थीं।
जिसके बिना उसने कभी एक दिन की कल्पना भी नहीं की थी।
आज वही पत्नी मशीनों के सहारे जिंदगी और मौत के बीच खड़ी थी।
डॉक्टर ने कुछ देर पहले कहा था—
“स्थिति गंभीर है।”
बस दो शब्द थे।
लेकिन इन दो शब्दों ने उसके पैरों के नीचे की जमीन खींच ली थी।
वह उठकर ICU के शीशे के पास गया।
अंदर उसकी पत्नी लेटी थी।
चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क था।
हाथ में ड्रिप लगी थी।
मशीन पर चलती हुई कुछ रेखाएँ उसकी धड़कनों का हिसाब दे रही थीं।
वह शीशे के उस पार खड़ी जिंदगी को देख रहा था…
और उसके होंठ बिना आवाज़ के सिर्फ एक बात कह रहे थे—
“तू ठीक हो जा… मैं सब ठीक कर दूँगा।”
उसे क्या पता था…
कि कुछ चीजें इंसान की कोशिशों से ठीक नहीं होतीं।
आखिरी रात
करीब तीन बजे नर्स बाहर आई।
उसने कहा—
“मरीज आपसे मिलना चाहती हैं।”
उसके कदम जैसे जमीन पर पड़ ही नहीं रहे थे।
वह ICU के अंदर गया।
पत्नी ने धीरे से आँखें खोलीं।
कमजोर-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई।
वह उसके पास बैठ गया।
उसने पत्नी का हाथ अपने हाथ में लिया।
हाथ बहुत ठंडा था।
वह कुछ बोल नहीं पाया।
पत्नी ने धीमी आवाज़ में पूछा—
“तुम रोए हो?”
उसने तुरंत नजरें फेर लीं।
“नहीं तो…”
पत्नी मुस्कुराई।
“मुझसे झूठ बोलना अभी भी नहीं आया तुम्हें…”
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसने पत्नी का हाथ अपने चेहरे से लगा लिया।
“तू ठीक हो जा… फिर जितना चाहे मुझे डाँटना… जितना चाहे लड़ना… बस वापस घर चल।”
पत्नी कुछ देर उसे देखती रही।
फिर बोली—
“अगर मैं…”
पति ने तुरंत उसका मुँह बंद कर दिया।
“ऐसा मत बोल।”
पत्नी ने फिर कहा—
“अगर मैं नहीं रही तो?”
उसने सिर हिलाया।
“तू रहेगी… मेरे साथ रहेगी।”
पत्नी ने बहुत धीरे से कहा—
“हर बार जिंदगी हमारी बात नहीं मानती।”
उसने पहली बार महसूस किया कि शायद पत्नी को सब समझ आ गया है।
वह उसका हाथ और कसकर पकड़ने लगा।
“मैंने कुछ कम तो नहीं किया ना?”
यह सवाल पति ने पत्नी से नहीं…
खुद से पूछा था।
पत्नी ने उसकी आँखों में देखा।
शायद उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ था।
लेकिन शरीर में ताकत नहीं थी।
उसने सिर्फ इतना कहा—
“तुमने… बहुत किया।”
पति फूट पड़ा।
वह उसका हाथ पकड़कर रोने लगा।
“मुझे छोड़कर मत जाना…”
पत्नी ने उसके सिर पर हाथ रखने की कोशिश की।
हाथ आधे रास्ते में ही गिर गया।
उसने आखिरी बार उसे देखा।
और बहुत धीमे से कहा—
“अपना ख्याल रखना…”
पति ने कहा—
“तू खुद रखेगी मेरा ख्याल…”
लेकिन इस बार पत्नी ने कोई जवाब नहीं दिया।
मशीन की आवाज़ बदलने लगी।
नर्स दौड़कर आई।
डॉक्टर अंदर आए।
पति को बाहर कर दिया गया।
वह दरवाजे के बाहर खड़ा था।
उसके कानों में सिर्फ मशीन की आवाज़ थी।
कुछ मिनट बाद डॉक्टर बाहर आए।
उनके चेहरे पर वह भाव था जिसे कोई पति कभी नहीं देखना चाहता।
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
“हमें अफसोस है…”
बस।
इतने शब्द।
और एक आदमी की पूरी दुनिया खत्म।
उस दिन के बाद…
लोगों ने कहा—
“समय पर इलाज नहीं मिला होगा।”
किसी ने कहा—
“अच्छे अस्पताल ले जाते तो बच जाती।”
किसी ने कहा—
“पति ने शायद गंभीरता नहीं समझी।”
और किसी ने तो यह भी कह दिया—
“इलाज में कमी रही होगी।”
हर बार वह चुप रहा।
क्योंकि वह जानता था…
वह उन रातों का हिसाब किसी को नहीं दे सकता।
वह कैसे बताए कि उसने कितनी बार पत्नी के माथे पर हाथ रखकर पूछा था—
“दर्द कम हुआ?”
वह कैसे बताए कि उसकी पत्नी की हर कराह उसके सीने को चीर देती थी?
वह कैसे बताए कि डॉक्टर की फीस से ज्यादा उसे पत्नी की सांसों की चिंता थी?
वह कैसे बताए कि जब डॉक्टर कहते थे—
“देखते हैं…”
तो उसके लिए उन दो शब्दों में पूरी जिंदगी टंगी होती थी?
लोगों को सिर्फ परिणाम दिखाई दिया—
पत्नी मर गई।
लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि पति ने उसे बचाने के लिए कितनी बार खुद को भीतर से मारा था।
फिर एक दिन उसने दोबारा घर बसाया…
बहुत लोगों ने समझाया—
“अकेले जिंदगी नहीं कटती।”
वह भी इंसान था।
उसका घर सूना था।
दीवारों पर पत्नी की तस्वीरें थीं।
लेकिन घर में उससे बात करने वाला कोई नहीं था।
उसने बहुत सोचकर दूसरी शादी कर ली।
लोगों ने कहा—
“अब तो खुश रहो।”
वह कोशिश करने लगा।
उसने सोचा—
शायद जिंदगी उसे दूसरा मौका दे रही है।
शायद कोई उसके पुराने घावों को समझेगा।
शायद कोई उसके अतीत को सम्मान देगा।
शायद कोई उससे कभी यह नहीं पूछेगा—
“तुम उसे बचा क्यों नहीं पाए?”
लेकिन जिंदगी ने उसे एक और परीक्षा के लिए बचाकर रखा था।
वह एक वाक्य…
एक दिन घर में किसी बात पर बहस हो गई।
बात बढ़ते-बढ़ते उसकी पहली पत्नी तक पहुँच गई।
और तभी दूसरी पत्नी ने गुस्से में कह दिया—
“तुमने अपनी पहली पत्नी का इलाज ठीक से करवाया होता… तो वह आज जिंदा होती।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
वह आदमी बिल्कुल शांत हो गया।
जैसे किसी ने उसके सीने पर हथौड़ा मारकर वर्षों पुराना घाव फिर खोल दिया हो।
उसने अपनी पत्नी को देखा।
कुछ कहना चाहा…
लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।
उसके कानों में अचानक अस्पताल की मशीन की आवाज़ गूंजने लगी।
उसे ICU याद आया।
वह आखिरी रात याद आई।
पत्नी का ठंडा हाथ याद आया।
उसकी आवाज़—
“तुमने बहुत किया…”
और फिर…
“अपना ख्याल रखना…”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
वह कुर्सी पर बैठ गया।
सिर दोनों हाथों में छुपा लिया।
और शायद पहली बार इतने वर्षों बाद उसके अंदर का वह आदमी चीख पड़ा—
“मैंने क्या नहीं किया था उसके लिए?”
उसकी आवाज काँप रही थी।
“मैं उसके साथ अस्पताल गया था…”
“मैंने डॉक्टर बदले थे…”
“दवाइयाँ लाया था…”
“रातें जागा था…”
“उसकी हर सांस के लिए भगवान से लड़ता रहा था…”
फिर अचानक उसकी आवाज टूट गई।
“लेकिन मैं मौत से नहीं लड़ पाया…”
वह रोते हुए बोला—
“क्या इसलिए मैं उसका कातिल हो गया?”
कोई जवाब नहीं था।
सिर्फ उसकी सिसकियाँ थीं।
उस रात वह अपनी पहली पत्नी की तस्वीर के सामने बैठा था।
बहुत देर तक।
उसने तस्वीर को देखा।
फिर धीरे से बोला—
“सब कहते हैं मैं तुम्हें बचा नहीं पाया…”
कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“तुम बताओ ना… मैंने कोशिश कम की थी क्या?”
आँसू तस्वीर पर गिरने लगे।
“मैंने कहीं देर कर दी थी क्या?”
“कहीं तुम्हें किसी और अस्पताल ले जाना चाहिए था?”
“कहीं मैं तुम्हारे लिए और कुछ कर सकता था?”
फिर वह फूट पड़ा।
“एक बार बोल दो ना… कि मेरी गलती नहीं थी…”
तस्वीर खामोश थी।
हमेशा की तरह।
और उस खामोशी ने शायद उसे अंदर से तोड़ दिया।
क्योंकि कभी-कभी इंसान को दुनिया से नहीं…
अपने मर चुके इंसान से जवाब चाहिए होता है।
मगर सच क्या था?
सच यह था कि पत्नी चली गई थी।
और पति उसके साथ नहीं गया था।
इसका मतलब यह नहीं कि वह खुश था।
इसका मतलब यह नहीं कि उसने उसे भुला दिया।
और यह भी नहीं कि उसने इलाज में लापरवाही की।
वह सिर्फ इसलिए जिंदा था क्योंकि मौत ने उसे नहीं बुलाया था।
और जिंदगी में दूसरी बार प्रेम करना…
पहले प्रेम से विश्वासघात नहीं होता।
जिंदगी का आगे बढ़ना…
बीते हुए इंसान को मिटाना नहीं होता।
लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पहले ही अपने जीवनसाथी की मौत का बोझ उठाकर चल रहा हो, यह कहना कि—
“तुमने इलाज ठीक करवाया होता तो वह बच जाती…”
उसके लिए सिर्फ एक वाक्य नहीं है।
यह एक ऐसी सजा है जिसकी कोई अदालत नहीं, कोई जेल नहीं, कोई जमानत नहीं।
वह हर रात खुद को दोषी मानकर सोएगा।
हर अस्पताल उसे कटघरे जैसा लगेगा।
हर दवा उसे अपराध की याद दिलाएगी।
हर बार किसी की मौत की खबर सुनेगा तो अपने मन में वही सवाल दोहराएगा—
“क्या मेरी पत्नी को भी मैं बचा सकता था?”
और अब आखिरी सवाल…
क्या उस पति को मर जाना चाहिए?
नहीं।
उसे मरना नहीं चाहिए।
उसे जीना चाहिए।
बहुत मुश्किल से सही…
टूटकर सही…
आँसू पीकर सही…
लेकिन जीना चाहिए।
क्योंकि शायद उसकी पहली पत्नी कहीं होती तो आज उसके कान में सिर्फ यही कहती—
“मैं तुम्हें दोषी देखकर नहीं गई थी…”
“मैं तुम्हें जीते हुए देखना चाहती थी…”
“मेरे जाने को अपनी सजा मत बनाना…”
और शायद उस आदमी को एक दिन अपनी ही यादों से कहना चाहिए—
“मैं तुम्हें बचा नहीं पाया…
लेकिन मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ी थी।”
क्योंकि…
हर मौत के पीछे किसी का अपराध नहीं होता।
कुछ लोग बीमारी से हार जाते हैं।
कुछ लोग वक्त से हार जाते हैं।
कुछ लोग किस्मत से हार जाते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पीछे छूट गया इंसान दोषी है।
और अगर किसी को सच में लगता है कि इलाज में लापरवाही हुई थी…
तो उसका फैसला आरोपों से नहीं, तथ्यों और चिकित्सकीय जाँच से होना चाहिए।
किसी शोक में डूबे इंसान को अपराधी बना देना न्याय नहीं है।
वह पहले ही अपना सबसे अपना खो चुका है।
उससे उसकी बची हुई जिंदगी मत छीनिए।
क्योंकि…
पत्नी की मौत ने उसके घर को सूना किया था,
लेकिन एक वाक्य ने उसके भीतर का पूरा घर जला दिया।
और शायद सबसे दर्दनाक बात यह है—
जिस आदमी ने अपनी पत्नी को बचाने के लिए रातें जागकर गुजारी थीं,
उसी आदमी को बाद में अपनी ही नींद से डर लगने लगा…
कहीं आँखें बंद करते ही वही सवाल फिर न आ जाए—
**“अगर मैंने थोड़ा और इलाज करवाया होता…
तो क्या तुम आज मेरे पास होती?”**
और उस सवाल का जवाब…
शायद उसकी पहली पत्नी ही जानती थी।
लेकिन वह…
अब कभी जवाब देने नहीं आएगी।