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Relationकर्म

चिंता से चिता तक का सफर

By Unknown Writer
August 14, 2026 3 Min Read
1

कुछ लोग मरने से पहले ही बहुत बार मर चुके होते हैं…

लोग कहते हैं जिंदगी बहुत खूबसूरत है…
लेकिन शायद उन्होंने जिंदगी का वह चेहरा नहीं देखा, जहाँ सुबह होने पर खुशी नहीं होती और रात आने पर सुकून नहीं मिलता।

मेरे हिस्से में भी कभी रिश्ते आए थे,
कभी प्यार आया था,
कभी किसी के साथ होने का एहसास था।

लेकिन वक्त ने एक-एक करके सब छीन लिया।

आज मेरे पास बहुत कुछ है…
फिर भी ऐसा लगता है जैसे मेरे पास कुछ भी नहीं है।

घर है, लेकिन घर जैसा अपनापन नहीं।
लोग हैं, लेकिन अपना कहने वाला कोई नहीं।
साँसें चल रही हैं, लेकिन जीने की वजह कहीं पीछे छूट गई है।

सबसे बड़ा दुख गरीबी नहीं होती,
सबसे बड़ा दुख अकेलापन होता है।

जब इंसान के पास अपना दुख सुनाने वाला कोई नहीं होता,
तो वह अपने ही भीतर एक कमरा बना लेता है…
और फिर धीरे-धीरे उसी कमरे में कैद हो जाता है।

वहाँ कोई आवाज नहीं होती।
कोई दस्तक नहीं होती।
कोई पूछने वाला नहीं होता—

“आज तुम इतने चुप क्यों हो?”

बस यादें होती हैं…
कुछ अधूरे रिश्ते होते हैं…
कुछ टूटे हुए वादे होते हैं…
और उन सबके बीच बैठा हुआ एक इंसान होता है,
जो बाहर से जिंदा दिखाई देता है और भीतर से जाने कितनी बार मर चुका होता है।

अब तो कभी-कभी आईना भी अजनबी लगता है।

चेहरा वही है,
आँखें वही हैं,
लेकिन उनमें वह इंसान नहीं बचा
जो कभी छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाया करता था।

अब खुशी आती भी है तो दरवाजे से लौट जाती है।

क्योंकि दिल ने जैसे मान लिया है कि
खुशियाँ उसके हिस्से में ज्यादा देर टिकती ही नहीं।

हर दिन कोई नई चिंता लेकर आता है।
कल की चिंता…
रिश्तों की चिंता…
अकेलेपन की चिंता…
भविष्य की चिंता…

और फिर यही चिंताएँ धीरे-धीरे इंसान को उस रास्ते पर ले जाती हैं,
जहाँ मंजिल दिखाई नहीं देती—
सिर्फ थकान दिखाई देती है।

कभी लगता है,
मैं जिंदगी नहीं जी रहा…

बस जिंदगी को ढो रहा हूँ।

दिन गुजरते हैं,
महीने गुजरते हैं,
साल गुजरते हैं…

और मैं भी हर गुजरते दिन के साथ
अपने ही अंत के थोड़ा और करीब होता जाता हूँ।

शायद यही सबसे डरावनी बात है—

इंसान एक दिन में नहीं टूटता।
वह रोज थोड़ा-थोड़ा टूटता है।

पहले उम्मीद मरती है।
फिर भरोसा मरता है।
फिर रिश्तों पर विश्वास मरता है।
फिर किसी के आने की प्रतीक्षा मरती है।

और आखिर में इंसान सिर्फ आदत से जीता रहता है।

लोग पूछते हैं—
“सब ठीक है?”

और हम मुस्कुराकर कहते हैं—
“हाँ।”

क्योंकि किसके पास इतना समय है कि हम उन्हें बता सकें कि
हमारे भीतर कितना कुछ ठीक नहीं है?

किसे बताएं कि रातों की नींद सिर्फ नींद नहीं होती,
वह उन तमाम सवालों से लड़ाई होती है जिनका कोई जवाब नहीं मिलता।

किसे बताएं कि कभी-कभी भीड़ में खड़े होकर भी
इतना अकेला महसूस होता है कि लगता है
जैसे पूरी दुनिया पास होकर भी बहुत दूर है।

और शायद मेरी कहानी भी ऐसी ही हो गई है—

चिंताओं से शुरू हुई,
अकेलेपन में पलती रही,
यादों में उलझती रही
और अब धीरे-धीरे चिता की ओर बढ़ती जा रही है।

फर्क सिर्फ इतना है कि
मुझे नहीं पता उस रास्ते पर मेरे साथ कौन चलेगा।

शायद कोई नहीं।

शायद आखिर तक मैं अकेला ही रहूँगा।

लेकिन अगर कभी कोई मेरी आँखों में झाँककर पूछ ले—

“तुम सच में कैसे हो?”

तो शायद पहली बार मैं मुस्कुराने की कोशिश नहीं करूँगा।

शायद बस इतना कहूँगा—

“बहुत थक गया हूँ…
बहुत कुछ खो चुका हूँ…
और अब अपने भीतर बचे हुए उस इंसान को ढूँढ रहा हूँ,
जो कभी सच में जीना चाहता था।”

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Unknown Writer

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One Comment
  1. bhagyavati vyas says:
    August 15, 2026 at 12:06 am

    Kya kaha jaye isme

    Reply

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