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कर्म

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ

By Dev Narayan Chhangani
August 14, 2026 4 Min Read
1

“मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ।”

इन पंक्तियों में जीवन का वह दर्शन छिपा है, जहाँ इंसान मृत्यु से नहीं, अधूरे जीवन से डरता है। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है, लेकिन उससे पहले यदि मनुष्य अपने हिस्से का जीवन पूरी तरह जी ले, अपने सपनों को छू ले, अपनों को प्रेम दे दे और अपने मन की बात कह दे—तो फिर विदा होने का भय भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

जीवन लंबा होना जरूरी नहीं, जीवन का पूर्ण होना जरूरी है।

हम अक्सर जिंदगी को कल के भरोसे छोड़ देते हैं।
सोचते हैं—कल समय मिलेगा, कल किसी अपने से बात करेंगे, कल अपने सपने पूरे करेंगे, कल खुद के लिए जिएँगे।
लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा भ्रम यही “कल” है।

किसे पता अगली सुबह हमारी प्रतीक्षा कर रही है या नहीं?

इसलिए जो प्रेम है, उसे आज कह दीजिए।
जिसे माफ करना है, आज कर दीजिए।
जिससे गले मिलना है, आज मिल लीजिए।
जिस सपने के लिए दिल वर्षों से बेचैन है, उसकी तरफ पहला कदम आज बढ़ाइए।

क्योंकि जब जीवन का अंतिम पड़ाव आएगा, तब शायद हमारे पास धन, पद, प्रतिष्ठा या उपलब्धियों की लंबी सूची न हो—लेकिन अगर हमारे पास यह संतोष होगा कि “मैंने अपनी जिंदगी अपने मन से जी थी”, तो शायद मृत्यु भी उतनी भयावह नहीं लगेगी।

मृत्यु अंत नहीं, एक यात्रा का पड़ाव है

हम जन्म लेते हैं, कुछ रिश्ते बनाते हैं, कुछ लोगों से बिछड़ते हैं, कुछ सपने पूरे करते हैं और कुछ सपने अधूरे छोड़ जाते हैं।

कभी कोई अपना अचानक चला जाता है और हमें लगता है कि जिंदगी रुक गई।

लेकिन जिंदगी रुकती नहीं।

वह हमें सिखाती है कि जो आया है, उसे एक दिन जाना भी है।

फिर सवाल यह नहीं रह जाता कि “मैं कब जाऊँगा?”

सवाल यह हो जाता है—

“जब तक हूँ, तब तक किस तरह जीऊँगा?”

अगर मेरे होने से किसी के चेहरे पर मुस्कान आती है, तो मेरा होना सार्थक है।

अगर मेरी वजह से किसी टूटे हुए इंसान को उम्मीद मिलती है, तो मेरा जीवन सार्थक है।

अगर मैंने किसी को सच्चा प्रेम दिया, बिना किसी स्वार्थ के किसी का हाथ थामा, किसी के आँसू पोंछे और किसी के अंधेरे में दीपक बन सका—तो शायद यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

“मैं मन से मरूँ” का अर्थ हारना नहीं है

मन से मरना यहाँ निराश होकर टूट जाना नहीं है।

बल्कि इसका अर्थ है—

अपने अहंकार को मार देना,
अपनी शिकायतों को मार देना,
अपने भीतर के डर को मार देना,
और उन चीजों से मुक्त हो जाना जो हमें जीने नहीं देतीं।

जब मनुष्य यह समझ जाता है कि हर रिश्ता हमेशा साथ नहीं रहेगा, हर व्यक्ति हमेशा अपना नहीं रहेगा और हर सुबह हमेशा नहीं आएगी—तब वह छोटी-छोटी बातों में उलझना छोड़ देता है।

फिर उसे किसी की निंदा छोटी लगती है।
किसी की बेरुखी छोटी लगती है।
किसी का छोड़कर जाना भी जीवन का एक हिस्सा लगने लगता है।

क्योंकि उसे समझ आ जाता है—

जिसे जाना है, वह जाएगा।
जिसे रहना है, वह रहेगा।
और मुझे अपने हिस्से की जिंदगी जीते रहना है।

लौटकर आऊँगा…

“लौटकर आऊँगा” सिर्फ पुनर्जन्म की बात नहीं है।

कभी इंसान अपनी यादों में लौटता है।
किसी की आँखों में लौटता है।
किसी की मुस्कान में लौटता है।
किसी पुराने गीत में लौटता है।
किसी किताब के पन्नों में लौटता है।
किसी की कही हुई बात में लौटता है।

इंसान चला जाता है, लेकिन उसका प्रेम नहीं जाता।

उसकी अच्छाई नहीं जाती।

उसके द्वारा दिए गए संस्कार नहीं जाते।

उसकी यादें नहीं जातीं।

कभी-कभी कोई इंसान दुनिया से चला जाता है, लेकिन किसी के दिल में वह जिंदगी भर सांस लेता रहता है।

शायद यही असली “लौटकर आना” है।

कूच से क्यों डरूँ?

जब सफर शुरू किया था, तब मंजिल का पता नहीं था।

आज अगर मंजिल सामने खड़ी है, तो फिर डर कैसा?

जिसने जीवन को स्वीकार कर लिया, वह मृत्यु से क्यों डरे?

कूच तो हर किसी को करना है।

कोई पहले जाता है, कोई बाद में।

लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग जाते समय पछताते हैं—

“काश मैंने जिंदगी थोड़ी और जी होती…”

और कुछ लोग मुस्कुराकर कहते हैं—

“जो मिला, जी भरकर जिया।
जो प्रेम मिला, पूरे मन से किया।
जो सपना देखा, उसके पीछे भागा।
जो खोया, उसे स्वीकार किया।
और अब जाने की बारी है… तो फिर डर कैसा?”

शायद जीवन की सबसे बड़ी जीत यही है—

मृत्यु से पहले मर जाना नहीं,
बल्कि मृत्यु आने तक पूरी तरह जी लेना।

इसलिए जब तक साँस है, प्रेम कीजिए।
जब तक समय है, अपने लोगों के साथ रहिए।
जब तक दिल धड़कता है, अपने सपनों का पीछा कीजिए।

और जब कभी जिंदगी के अंतिम मोड़ पर खड़े हों, तो मन में इतना संतोष जरूर हो—

“मैं जी भर जिया…
मैंने किसी का दिल जानबूझकर नहीं तोड़ा…
मैंने प्रेम किया…
मैंने सपने देखे…
मैं गिरा, फिर उठा…
मैं रोया, फिर मुस्कुराया…
मैंने अपनी जिंदगी को सिर्फ काटा नहीं,
उसे महसूस किया था।”

फिर शायद आखिरी विदाई भी डर नहीं लगेगी।

क्योंकि जिसने जीवन को पूरी तरह स्वीकार कर लिया हो, उसे कूच से डर नहीं लगता।

“मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ…”

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Dev Narayan Chhangani

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One Comment
  1. bhagyavati vyas says:
    August 14, 2026 at 11:10 am

    Baadhiya

    Reply

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